ग़ज़ल: जुगनू को आफ़ताब बनाए चले हो
जुगनू को आफ़ताब बनाए चले हो,
काहे को चराग़ बुझाए चले हो
पत्थर को देवता कहे जाते हो,
आइनों को धूल चढ़ाए चले हो
सच को हकीकत कौन कहेगा भला,
झूठी कहानी सुनाए चले हो
दिल में अँधेरों का है आलम सारा,
और रौशनी से कतराए चले हो
फूलों से मुमकिन थी बहारें सारी,
काँटों को बग़ीचा बनाए चले हो
नज़रों से छुपा लोगे क्या सच कभी,
दुनिया को पर्दा दिखाए चले हो
लफ़्ज़ों में ढूँढते हो सुकून “रईस”,
और ग़म को गीत बनाए चले हो
©️🖊️ डॉ. शशांक शर्मा “रईस”