एक लड़की को गाते गाते हम शायर बन बैठे हैं– गीत।
चलते चलते दुनिया के सब गम अपने कर बैठे हैं,
एक लड़की को गाते गाते हम शायर बन बैठे हैं।
न वो चंदा न ही अप्सरा न हिरणी सी चलती है,
न ही मन को मचलाने वाली मादकता ढहती है,
उसकी तो भोली भाली सीधी गिनती सी सीरत है,
एक कविता जैसी सुंदर आम सी उसकी सूरत है।
छिपते–छिपाते आंखों में उसकी खुद को खो बैठे हैं,
एक लड़की को गाते गाते हम शायर बन बैठे हैं।।
चलते चलते दुनिया के सब गम अपने कर बैठे हैं,
एक लड़की को गाते गाते हम शायर बन बैठे हैं।
हाथों में न चूड़ी दिखती न सोलह श्रृंगार करे,
न माथे पर बिंदिया चमके गले न सुंदर हार दिखे,
आम से कपड़ों में बिन काजल मृगनयनी सी लगती है,
उसके आगे सब उपमाएं फीकी–फीकी लगती हैं।
उसकी इन उपमाओं में चंदा सूरज सब बैठे हैं,
एक लड़की को गाते गाते हम शायर बन बैठे हैं।
चलते चलते दुनिया के सब गम अपने कर बैठे हैं,
एक लड़की को गाते गाते हम शायर बन बैठे हैं।
लेखक/कवि
अभिषेक सोनी “अभिमुख”
ललितपुर, उत्तर–प्रदेश
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