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20 Sep 2025 · 2 min read

ख़री बात : माया और आत्मा का द्वंद

ख़री बात : माया और आत्मा का द्वंद

(A Dialogue between Illusion and the Soul)

✍️ – कुँवर सर्वेंद्र विक्रम सिंह
©️®️ सर्वाधिकार सुरक्षित

प्राक्कथन (Preface)

संत कबीर की वाणी का मूल स्वर रहा है—सीधी, खरी और बेख़ौफ़ बात।
मेरी यह रचना “ख़री बात : माया और आत्मा का द्वंद” उसी परंपरा की आधुनिक प्रतिध्वनि है।

“सत्य बाहर के कर्मकांडों में नहीं, आत्मा के भीतर प्रज्वलित ज्योति में है।”
प्रेम, करुणा और सत्य जीवन को उसके बंधनों से मुक्त कर अमरत्व के पथ पर ले जाते हैं।
मेरी यह रचना हम सभी को भीतर से जागने का निमंत्रण देती है।

–कुँवर सर्वेंद्र विक्रम सिंह

मुख्य रचना

1. भूमिका

कहत कबीर सुनो भाई साधू, करूं न मैं मसखरी
सुनो ऐ हरि, सुनो ऐ परी, हैं बातें खरी–खरी

भाषा–बोली लड़ते देखा, क्षेत्र का पचड़ा भारी
न इनमें रस, न इनमें यश, सभी की सुध है मारी

घाव ये गहरे कोई न देखे, भाव बने सब सहरा
अन्दर कुछ भी रंग न पाया, बाहर झूठ सुनहरा

कहत कबीर चखो ऐ साधू, जीवन है रसभरी
सुनो ऐ हरि, सुनो ऐ परी, हैं बातें खरी–खरी

2. धर्म और आडंबर

मंदिर–मस्जिद बाँट रहे जो, भीतर से हैं खाली
ढोंगी–पंडित, काज़ी–मुल्ला, सब बुद्धि बेहाली

कहत कबीर वही है साधू, जो अंदर में जागे
सत्य–प्रेम का रस जो पीवे, जग–अंतर में भागे

कहत कबीर अमर रस पीयो, जीवन है कारागरी
सुनो ऐ हरि, सुनो ऐ परी, हैं बातें खरी–खरी

3. माया और धन

धन के पीछे दौड़ा देखा, भूले तन–मन जाना
माया की ज़ज़ीरों में बँध, खोया सब बेमाना

धन की लालच में खोएं हैं, मन के सभी शृंगार
माया के पंखों पर उड़ते, साधू–तन संसार

कहत कबीर सुनो भाई साधू, माया सब मदभरी
सुनो ऐ हरि, सुनो ऐ परी, हैं बातें खरी–खरी

4. जाति और आत्मा

जाति–पांति मत देखो साधू, एक समान हैं प्रानी
सबके अंदर एक राग है, सबमें ज्योति पुरानी

जाति हमारी आत्मा है, गोत्र हमारा ब्रह्म
सत्य हमारा जापना है, मुक्ति हमारा धर्म

कहत कबीर हैं जाति न मानो, आत्मा ही है खरी
सुनो ऐ हरि, सुनो ऐ परी, हैं बातें खरी–खरी

5. जीवन और साधना

जीवन–पथ पर गर सुख हैं, दुःख के कष्ट भी भारी
कदम–कदम पे सीख हैं देते, रस्तों के व्यापारी

सूरज–चाँद की छाया में, पवन है गाती सरगम
जीवन–धारा संग चलो, मन–भरम न पालो हरदम

कहत कबीर सुनो भाई साधू, कर्म के सब रहबरी
सुनो ऐ हरि, सुनो ऐ परी, हैं बातें खरी–खरी

6. ब्रह्म और प्रेम

ब्रह्म–शिखर के पर्वत से, निकला सृष्टि का पानी
धरा पे कल–कल सरिता उतरी, जीवन हुआ रवानी

हर सुख–दुःख में सीख छिपी है, अनुभव रहता जारी
प्रेम में साध लो करुणा को, यही साधना प्यारी

कहत कबीर हैं छोड़ दिखावा, मन में जोत है धरी
सुनो ऐ हरि, सुनो ऐ परी, हैं बातें खरी–खरी

✍️ – कुँवर सर्वेंद्र विक्रम सिंह
(स्वरचित रचना)
©️®️ सर्वाधिकार सुरक्षित

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