मोहब्बत खो गई
कहानी
मोहब्बत खो गई
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कहानी शुरू होती है एक छोटे से कस्बे की। जहां लड़कियों को शिक्षा देना अच्छा नहीं समझते थे।रुचि साधारण-सी लड़की थी।रुचि का सपना था कि पढ़-लिखकर एक दिन अपने परिवार का नाम रोशन करना। गरीबी के बावजूद वह पढ़ाई में होशियार थी। उसके पिता मिल में मजदूरी का काम करते थे और मां घर-घर जाकर काम करती थी।रुचि का जीवन कठिनाइयों से भरा था, लेकिन उसकी आंखों में सपने और दिल में हौसले की कमी नहीं थी।
घर के हालात ठीक ना होने के कारण रुचि अपने मामा जी के यहां पढ़ाई के लिए शहर में आ गई।
कॉलेज में दाख़िला लेने के बाद उसकी मुलाक़ात आलोक से हुई। आलोक भी एक छोटे से गांव का किसान परिवार का लड़का था। तथा होशियार और मददगार था।आलोक का सपना भी आर्मी ऑफिसर बनने का था।
दोनों पहले दोस्त बने, फिर धीरे-धीरे दोस्ती मोहब्बत में बदल गई।
आलोक , रुचि की मेहनत और जुनून से प्रभावित था। जब-जब रुचि हार मानने लगती, आलोक उसे संभाल लेता। रुचि की पढ़ाई पूरी हुई, और वह मेहनत करके बैंक अधिकारी बन गई। पूरे परिवार की ज़िंदगी बदल गई। पिता की आंखों में गर्व के आंसू थे, और मां कहती – “बेटी ने हमारे सपनों को सच कर दिया।”
लेकिन जहाँ रुचि की मंजिल पूरी हुई, वहीं उसकी मोहब्बत पीछे छूटने लगी। नौकरी की जिम्मेदारियों, समाज की बंदिशों और परिवार की उम्मीदों के बीच रुचि औरआलोक के रिश्ते में दूरियाँ बढ़ने लगीं।
आलोक चाहता था कि रुचि उसकी पत्नी बने और साथ में ज़िंदगी बिताए, लेकिन समाज का दबाव, परिवार की हैसियत और रिश्तेदारों की बातें एक दीवार बन गईं। रुचि ने आलोक को समझाया –
आलोक , मैंने मंज़िल पाई है, लेकिन शायद अब मोहब्बत मेरे हिस्से में नहीं लिखी थी।”
आलोक मुस्कुराकर बोला :
“रुचि , मैं तुमसे नाराज़ नहीं हूँ। तुम्हारी सफलता ही मेरी जीत है। मोहब्बत खो गई तो क्या हुआ, मुझे गर्व है कि तुमने अपने सपने पूरे किए।”
रुचि की आंखों से आंसू बह निकले। उसने अपनी मंजिल तो पा ली, लेकिन दिल में खालीपन रह गया। मोहब्बत की जगह अब सिर्फ यादें रह गईं।
और कुछ दिनों के बाद ही आलोक का भी आर्मी से जॉइनिंग लेटर आ गया। और वह बिना कुछ कहे नौकरी पर चला गया।
इस तरह से रुचि और आलोक की मंजिलें अलग-अलग हो गई।
ज़िंदगी ने रुचि और आलोक को मंज़िल तो दी, लेकिन मोहब्बत छीन ली।
“कभी-कभी सपनों की कीमत मोहब्बत खोने से चुकानी पड़ती है।
रुचि अफसर बन गई, नाम और शोहरत सब कुछ पा लिया।
पर हर सफलता के बीच दिल में एक खालीपन था। आलोक अब सिर्फ उसकी यादों में रह गया।
कभी-कभी फाइलों के बीच, सरकारी बैठकों के बीच, या अकेली रातों में उसे आलोक की हँसी और बातें याद आतीं।
उसकी आँखें नम हो जातीं और मन कहता –
“मंज़िल तो मिल गई… पर मोहब्बत खो गई।”