गजल– तू बस मुस्कुराया कर।
आईना यूं न हर वक्त आंखों से लगाया कर,
शेर खुद बन जाता है तू बस मुस्कुराया कर।
महजबीन तेरे इश्क के समुंदर में डूबा हूं,
किनारे रह तैरकर उस पार न जाया कर।
यूं तो दरख़्त की तरह मैं भी हूं स्थिर लेकिन,
कभी हुस्न ए इबादत मुझसे भी कराया कर।
डूब चुका हूं तेरी इन आंखों की गहराई में,
समुंदर पास रखती है मुझे तैरना सिखाया कर।
और इश्क विश्क कुछ नहीं होता “अभिमुख”
यहां गम बहुत हैं तू बस मुस्कुराया कर।
लेखक/कवि
अभिषेक सोनी “अभिमुख”
ललितपुर, उत्तर–प्रदेश
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