Sahityapedia
Sign in
Home
Your Posts
QuoteWriter
Account
18 Sep 2025 · 1 min read

मैंने कुछ लुत्फ़ तो उठाया है

मैंने कुछ लुत्फ़ तो उठाया है
दाम उसका मगर चुकाया है

क्या कोई वक़्त को समझ पाया
वक़्त अपना है या पराया है

तेरी यादों का आसरा लेकर
जोर फुरक़त से आजमाया है

चांद ने नींद छीन ली मेरी
धूप ने ही मुझे सुलाया है

आँधियों इस शजर को मत छेड़ो
इसके बुलबुल ने घर बसाया है

फासलों के तवील दरिया पर
तेरी यादों का पुल बनाया है

ख़ाक दैरो-हरम की छानी पर
वो तो दिल में मेरे समाया है

शाम को आए थे वो टेरिस पर
कुर्सियों ने मुझे बताया है

दिल किसी की नजर में कौड़ी है
पर किसी ने जहां लुटाया है

ढूँढता फिर रहा हूँ वो कोना
तेरे ख़त को जहां छुपाया है

धूप मुझपे असर नहीं करती
मेरे सर पे ग़मों का साया है

Loading...