मैंने कुछ लुत्फ़ तो उठाया है
मैंने कुछ लुत्फ़ तो उठाया है
दाम उसका मगर चुकाया है
क्या कोई वक़्त को समझ पाया
वक़्त अपना है या पराया है
तेरी यादों का आसरा लेकर
जोर फुरक़त से आजमाया है
चांद ने नींद छीन ली मेरी
धूप ने ही मुझे सुलाया है
आँधियों इस शजर को मत छेड़ो
इसके बुलबुल ने घर बसाया है
फासलों के तवील दरिया पर
तेरी यादों का पुल बनाया है
ख़ाक दैरो-हरम की छानी पर
वो तो दिल में मेरे समाया है
शाम को आए थे वो टेरिस पर
कुर्सियों ने मुझे बताया है
दिल किसी की नजर में कौड़ी है
पर किसी ने जहां लुटाया है
ढूँढता फिर रहा हूँ वो कोना
तेरे ख़त को जहां छुपाया है
धूप मुझपे असर नहीं करती
मेरे सर पे ग़मों का साया है