( छत्तीसगढी--हास्य व्यंग्य-बदलता वर्तमान परिवेश )
( छत्तीसगढी–हास्य व्यंग्य-बदलता वर्तमान परिवेश )
आज के लैका मन ला किताब पढ़ना नइ सुहाय,
अब उन सुतते घलो मोबाइल म आंखी गड़ियाय।
अथान,बरी ,पापर,बासी ला लैका मन सूंघय नइ,
इनला चाही नुडुल्स ,पीजा ,,पास्ता, चिकन फ़्राय।
वाइफ के आते, कतको मां बाप से अलग हो जाथे,
सुवार्थी मन ला मां बाप के मतलब कोन समझाय्।
संस्कार, संस्कृति ला एमन भसकावत जावत हे,
अब के टुरी टुरा मन बरसों साथ रहिथे बिन बिहाय।
इन नइ जानय तीजा, पोला,हरेली तिहार के रसम,
पर 31 दिसंबर के तारीख इन रात भर घर नइ आय।
सामूहिक नशा पत्ती के चलन बाढ़त हे चौक चौक म,
कतको लैका दिखथे आंखी लाल करे गाल पिचकाय।।
दिल करथे इंखरे कस स्टाइल महूँ हा सीख जातेवं,
पर नइ सीख सकेवं भले करे हवं कतको बेर ट्राय।
( डॉ संजय दानी )