फँस चुके हैं खेत भी अब जाल में विज्ञान के।
फँस चुके हैं खेत भी अब जाल में विज्ञान के।
आधुनिक यंत्रों सहारे
हम फसल को बो रहे हैं।
डाल ज़हरीले रसायन
उर्वरा को खो रहे हैं।
फाँस्फोरस, यूरिया, पोटाश, सल्फर घोलकर,
खोल दरवाजे दिए हैं भूमि के अवसान के।
सैंकड़ों फुट खोदकर के
कूप कितने कर दिए है।
अश्व की ताकत बराबर
पंप उनमें भर दिए हैं।
नीर का स्तर घटा के कर दिया है निम्न अब,
विद्युती संयंत्र जिम्मेदार इस अपमान के।
छोड़कर जैविक तरीके
हम समय के पक्ष में है।
दुष्प्रभावों के नतीजे
झेलते प्रत्यक्ष में है।
जानते हैं सब किसी अभिशाप से कम तो नहीं है,
श्रेय फिर भी मिल रहे विज्ञान को वरदान के।
राजेश पाली ‘सर्वप्रिय’