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17 Sep 2025 · 1 min read

मजबूर ज़िंदगी

कभी खुशहाल था ये शहर अब
ग़म-ज़दा लगता है ,
हर शख़्स किसी न किसी बात से
ख़ौफ़ज़दा लगता है ,
बैचेनी का आलम हर सिम्त
पसरा सा लगता है ,

यह सब क्यूँ हुआ ? कैसे हुआ ?
ये सवाल ज़ेहन में कौधतें हैं,

कुछ कहने , गुफ़्तुगू करने ,
अपनी राय ज़ाहिर करने से
लोग क्यूँ डरते हैं ?

कुछ तो ऐसा हादसा हुआ जो
इंसानियत को
तार-तार कर गया ,

मजलूमों ,मासूमों को
ज़ार -ज़ार ख़ून के आँसू
रोने के लिए मजबूर कर गया ,

सरेआम माँ , बहू, बेटियों की ‘इस्मत
नीलाम की गई ,
हुक़ूमत तमाशाबीन बनी ये सब
देखती रह गई ,

इंसानियत को शर्मसार करने वाला
वा’क़िया अंजाम हुआ ,
तिस पर ख़ुदगर्ज़ो को सियासत चमकाने का
मौका मिल गया ,

इंसाफ़ की गुहार जानबूझकर अंधी बहरी बनी
हूक़ूमत पर असर करने में नाकाम रही ,

अवाम बेचारी ज़ालिमों के हाथों ज़ुल्मो -जब्र की
ज़िंदगी जीने को मजबूर की गई।

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