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17 Sep 2025 · 1 min read

सबरे जग रूठत तौ बन जाय, बनै न जरा ठकुरानि के रूठै।

सबरे जग रूठत तौ बन जाय, बनै न जरा ठकुरानि के रूठै।
निकसे नहिं प्राण भई सबरी गति, आस तिहार छुटाय न छूटै।
हम बाट निहार रहे कब ते , तव नेह की धार इतैं कब फूटै?
तुम आउ भयौ मन भीरु लगै मनु साँस की डोर कबै झटि टूटै।
*****
अंकित शर्मा ‘इषुप्रिय’

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