"जहाँ देखने की अभिलाषा मात्र भी ना रहे उस ख़ुदा, ईश्वर या उस
“जहाँ देखने की अभिलाषा मात्र भी ना रहे उस ख़ुदा, ईश्वर या उस व्यक्ति या जो भी प्रिय हो, और वो तुम्हारे अंदर तुम्हारी छवि में प्रवेश कर जाये तुम उसे चलते-फिरते अपने चारों ओर महसूस करो, तब सच में उस दिन आपने उसे पा लिया समझो। सही मायने में वही प्रेम सार्थक है।”
मधु गुप्ता “अपराजिता”