अतिथि की भांति
अतिथि की भांति
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अतिथि की भांति
जग में हैं आये,
व्यर्थ ही मन ने
हैं सपने सजाये।
क्षणिक है जीवन,
मृगतृष्णा का साया,
मुट्ठी में रेत-सा
सब कुछ सरक जाये।
स्मृतियां शेष
हृदय में मेरे,
अनमोल क्षण जो
तेरे संग बिताये।
कुछ बिछुड़न की कसक,
कुछ मिलन की हँसी,
इन्हीं लम्हों से
सजती है ज़िंदगी।
जग है मुसाफ़िरख़ाना,
राही सभी यहाँ,
यादों की लौ ही
अमर रहे सदा।
डॉ॰ फ़ौज़िया नसीम शाद