इंसाफ़ की गुहार
भरोसा किस पर करें कुछ समझ नही आता है ,
हरेक शख़्स एक मुखौटा पहने नज़र आता है ,
आये दिन फ़रेब खाने के किस्से आम होते हैं ,
धोखाधड़ी के नए-नए तरीक़े रोज़ाना ईजाद होते हैं ,
इन धोखों के जाल से कैसे बचें
इसी की फ़िक्र मे लोग रहते हैं ,
दिमाग़ रोज इसी उधेड़ बुन में
लगा होता है परेशाँ लोग रहते हैं ,
हुक़ूमत धोखाधड़ी को रोकने में
नाक़ाम नज़र आती है ,
‘अवाम फ़रेबियों जाल में किसी न किसी
तरह फँस ही जाती है,
कुछ तो ज़िंदगी भर कमाई पूँजी खोकर
मायूस मजबूर हो बैठे हैं ,
कुछ तो अपना सब कुछ गवांकर
ख़ुदकुशी तक कर बैठे हैं,
न जाने कब इन्सान का ज़मीर जाग पाएगा ,
क्या जब सब कुछ फ़रेबियों के हाथों चला जाएगा ?
बेईमानी और ख़ुदगर्ज़ी जब तलक
सर चढ़कर बोलेगी ,
सिसकती इंसानियत तब- तक
इंसाफ़ की गुहार लगाती ही
रह जाएगी।