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17 Sep 2025 · 1 min read

इंसाफ़ की गुहार

भरोसा किस पर करें कुछ समझ नही आता है ,
हरेक शख़्स एक मुखौटा पहने नज़र आता है ,

आये दिन फ़रेब खाने के किस्से आम होते हैं ,
धोखाधड़ी के नए-नए तरीक़े रोज़ाना ईजाद होते हैं ,

इन धोखों के जाल से कैसे बचें
इसी की फ़िक्र मे लोग रहते हैं ,
दिमाग़ रोज इसी उधेड़ बुन में
लगा होता है परेशाँ लोग रहते हैं ,

हुक़ूमत धोखाधड़ी को रोकने में
नाक़ाम नज़र आती है ,
‘अवाम फ़रेबियों जाल में किसी न किसी
तरह फँस ही जाती है,

कुछ तो ज़िंदगी भर कमाई पूँजी खोकर
मायूस मजबूर हो बैठे हैं ,
कुछ तो अपना सब कुछ गवांकर
ख़ुदकुशी तक कर बैठे हैं,

न जाने कब इन्सान का ज़मीर जाग पाएगा ,
क्या जब सब कुछ फ़रेबियों के हाथों चला जाएगा ?

बेईमानी और ख़ुदगर्ज़ी जब तलक
सर चढ़कर बोलेगी ,
सिसकती इंसानियत तब- तक
इंसाफ़ की गुहार लगाती ही
रह जाएगी।

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