अच्छे दिन ?
अपनी गाढ़ी कमाई डालकर हमने गाड़ी बनायी ,
लगता है हमारी यह गाड़ी सरकार को रास ना आई ,
असीमित टैक्स लगाकर हमसे
मनमर्जी टैक्स वसूल लिया ,
एक आम आदमी को मनचाहा
टैक्स लगाकर चूस लिया ,
अब तो गाड़ी उत्पादकों से भी
साठ-गाँठ हो गई है ,
गाड़ी बिक्री की नई प्रायोजित
नीती लागू हो गई है ,
पेट्रोल में इथेनॉल मिलाकर
प्रदूषण कम करने के नाम पर
गाड़ी का भट्टा बिठाओ ,
लोगों को चूना लगाकर
नई गाड़ी खरीदने की
मजबूरी का विकल्प जगाओ ,
उधर व्यापारिक हितों की सुरक्षा हो ,
गाड़ी निर्माता ,विक्रेता , ऋण प्रदाय संस्थाओं ,
एवं बीमा कम्पनियों के
व्यापार में वृद्धि हो ,
आम जनता बेबस लाचार
यह सब कुछ सहती रहे ,
विरोध करने पर
दंड भुगतने से डरती रहे ,
लोकतंत्र की स्वार्थपरक राजनीति ने
ये क्या हाल करके रख दिया है ?
देश की आम जनता को तानाशाही के दलदल में धकेलकर रख दिया है ,
कभी सोचा ना था अच्छे दिन का नारा देने वाले ,
इस कदर बुरे दिन भुगतने के लिए
मजबूर करके रख देंगे ,
अब हम मन मसोसकर दिन फिरने के इंतज़ार मे
ये दुर्दिन कब तक सहते रह़ेगे ?
@श्यामसुंदर सुब्रमण्यन्