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16 Sep 2025 · 1 min read

स्त्री तुम श्रद्धा हो

वह जल नहीं
धारा है,
जिसमें उतरने से पहले
कपड़ों की सलवटें,
फर्श की धुँधलाहट,
मिट्टी की गंध
सब धुल जाती है।

वह आग नहीं
चूल्हे की राख से
बार-बार उगती ज्वाला है,
जिसमें सब्ज़ियों की नमी
मसालों का धुआँ
घुलकर
गंध बन जाता है।

वह पगडंडी है
भीड़ की कोलाहल में भी
सही फल चुनती,
सही दाम बचाती
और थककर भी
घर लौट आती।

वह मौन नहीं
कुशन की तह,
पौधों की प्यास,
चादर की सलवट,
सब उसके हाथों में
बोल उठते हैं।

वह दर्पण नहीं
दीपक की लौ है
खुद को जलाकर
दूसरों की आँखों में
सुंदरता भर देती है।

उसकी बातें
नाटक नहीं
आवाज़ का नमक हैं,
उसके आँसू
धरती की नमी।

और प्रेम
उसका एकमात्र उत्तर है
हर प्रश्न के लिए।

तुम पूछते हो
“कितनी देर लगाती हो?”
वह मुस्कराती है
मानो नदी ने
पहाड़ से कहा हो,
“मैं बह रही हूँ,
तुम्हें छूने के लिए।”

-देवेंद्र प्रताप वर्मा ‘विनीत’

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