कही-कहायी (कहानी)
अपना निर्णय मै स्वयं ही लेती आई हूॅ । किसी के कहने पर मैं कोई धारणा नहीं रखती हूॅ ।
मैं जानती हूॅ कि लोग अपने स्वार्थ के लिए किसी को भी भ्रमित कर सकते हैं । ऐसा पढ़ाई, नौकरी के समय के साथ साथ निजी जीवन में भी होता है ।
वहाॅ तक तो सब ठीक है लेकिन मेरी शादी सुरेश के साथ मुम्बई में हुई
वह बिजनेस मेन है ।
मैं, सुनीता टीचर हूॅ यह तय हुआ कि मैं शादी के बाद नौकरी छोड़कर मुम्बई चली जाऊंगी।
इस बीच एक दिन मेरे पास फोन आया , उसने कहा :” सुरेश बिजनेस मेन है उसका काम और चरित्र अच्छा नहीं है , आगे आप खुद समझदार हैं, शादी के निर्णय पर फिर सोच लीजिए।”
इससे मेरे मन में खलबली जरूर मची लेकिन मैंने जरूरी काम से बाहर जाना है ऐसा कह कर मुम्बई निकल गयी ।
सुरेश के आफिस और उसके व्यक्तिगत जीवन के बारे मैंने खुद ही जानकारी ली ।
घर आ कर मैं अपने निर्णय पर अडिग रही , और इस निर्णय पर पहुंची कि :” जीवन में अपने निर्णय खुद सोच-समझकर लेना चाहिए, किसी की कही-कहायी को सुनने से अपनी बसी-बसायी जिन्दगी बरबाद हो सकती है ।
सुरेश बहुत सुलझे हुए और समझदार आदमी हैं ।
बाद में मालूम हुआ जिन्होंने मुझे भ्रमित करने की कोशिश की थी वह कोई और नहीं हमारे रिश्तेदार ही
थे ।
जीवन में आंख कान खोल कर रहना चाहिए और अपनी ज़िन्दगी अपने हिसाब से जीना चाहिए।
संतोष श्रीवास्तव