कुंडलिया. . . .
कुंडलिया. . . .
आया मुट्ठी बाँध कर, इस जग में इंसान ।
गया पसारे हाथ जब, तन से निकली जान ।।
तन से निकली जान , जीव की इतनी माया ।
मिट जाता अभिमान , चिता पर जलती काया ।।
जीवन का यह मर्म, अंत तक समझ न पाया ।
चला अकेला छोड़ , जगत् को जैसे आया ।।
सुशील सरना / 16-9-25