#लघुकथा *डिज़िटल युग का काला पक्ष।
#लघुकथा *डिज़िटल युग का काला पक्ष।
(प्रणय प्रभात)
एक पखवाड़े में आठवीं बार बीमार मालिनी मुँह लपेटे पड़ी थी। मुकुल रसोई में चाय और मैगी बना रहा था। जो साल भर से बच्चों के लिए भोजन का विकल्प बनी हुई थी। भूखे बच्चे रसोई की ओर ताक रहे थे। आनन-फानन में बनी मैगी बच्चो को दे कर मुकुल ने जल्दी-जल्दी चाय गटकी और ऑफिस के लिए तैयार होने लगा। सुबह की चाय बनाने और बीमार बीवी को दूध-ब्रेड देने के बाद साफ-सफाई, स्नान-ध्यान के चक्कर में उसे पहले ही काफ़ी देर हो चुकी थी।
काम निपटाने के बाद मुकुल स्कूल के लिए तैयार हुए बच्चों को लेकर कूच कर गया। पल-पल मद्धिम होती बाइक की आवाज़ मालिनी की बीमारी को दूर कर रही थी। उसने उठ कर एक अंगड़ाई लेते हुए मोबाइल उठाया और अपनी बहिन से वर्चुअल वार्ता में जुट गई। उसका सिर और बदन दर्द काफ़ूर हो चुका था। मालिनी अपनी बहिन से ऑनलाइन ट्रेनिंग लेने में व्यस्त थी। जिसके बलबूते उसका अपना जीवन परिवार के माहौल से उलट सुखमयी बना हुआ था।
इधर मालिनी अपनी बहन की ट्रेनिंग के सुखद परिणामों से गदगद थी, उधर टेलीविज़न पर देश से लुप्त हो चुकी नौटंकी कला के संरक्षण को लेकर बहस चल रही थी।
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