वह (पत्नी की याद में)
हमारी तबीयत नासाज़ हो जाती है जब कभी हमारे बीच अनबन होती है। उसके प्रेम की अटूट डोर में बंधने के बाद हम पहले से भी ज्यादा मुक्त हो गए हैं और ज़िन्दगी के उन्मुक्त गगन में विचरण करते हैं। हम वह पतंग है जो प्रगतिशील नभ में दिखते तो अकेले हैं लेकिन प्रीति की डोर से इस छोर से उस छोर तक हम एक दूजे से जुड़े होते हैं। वह मजाक में भी कभी डोर छोड़ने का जिक्र करती है तो हमें विकास के आकाश से धरित्री ही नजर आती है। ना वह वह है ना मैं मैं हूं। हम दोनों मिलकर हम हो गये हैं। वह भी सीधी है हम भी सीधे हैं फिर बात-बात पर लड़ाई क्यों होती है। हम दोनों मिलजुल कर इस रहस्य को समझने की कोशिश करते हैं लेकिन समझ नहीं पाते हैं। यह लड़ाई सावन की तरह होती है। रिमझिम रिमझिम बरसते बरसते कब प्रेम, करुणा और दया की धूप खिल जाती है पता ही नहीं चलता है। ज़िन्दगी की मरुभूमि लहलहा उठती है और प्रेम की सौंधी खुशबू महमहा उठती है। बिछड़ने को तो हम किसी न किसी से रोज बिछड़ते हैं, हर पल बिछड़ते हैं लेकिन उससे पहली बार मिलना और मिलकर बिछड़ना…. इस कसक को बयां करना असम्भव सा लग रहा है। ना कह पाए ना सह पाए। सिससकते सिसकते सो गये। ख्यालों की दुनिया में खो गए। हमारी रुचि एक दूसरे से भिन्न है। इसलिए थोड़ा मतभेद रहता है। सिर्फ मतभेद रहता है , मनभेद नहीं। वह मेरे जीवन का भावार्थ है। वह मेरे मन को बड़ी बारीकी से पढ़ती है और जिंदगी को नये सांचे में गढ़ती है। कभी मैं भटकता हूं तो उसको खटकता हूं। बिन बताए सब कुछ जान जाती है। मनाने पर सहजता से मान जाती है। हमारे मन में पहले एक दूसरे से जीतने का भाव था। अब एक दूसरे को जीतने का भाव है। वह मेरे मन का सुकून है। जीवन जीने का जुनून है।वह स्त्री है, धरती की तरह। मेरे जीवन के दर्पण को कर देती है साफ। मेरी गलतियों को मुस्कुराकर कर देती है माफ।
– डॉ. सुनील चौरसिया ‘सावन’