मर्यादित रिश्ते जहाँ, स्नेह सिक्त हो बात।
मर्यादित रिश्ते जहाँ, स्नेह सिक्त हो बात।
विपदा कट जाती सहज, मिले नहीं आघात।।
सहन शक्ति तरुवर हरित, होता है फलदार।
प्रेम बीज अंकुर जहाँ, समझ मृदा आधार।।
त्याग क्षमा सह शील से, बनता है परिवार।
गौरव भी मिलता उसे, सुखमय हो संसार।।
अपने कर्मों पर रखें, आलोचक सी नैन।
छोड़ परायापन यहाँ, मिलता हरपल चैन।।
वृथा मान सम्मान सभी, धन वैभव का दंभ।
“पाठक” शिव पग गह चला, करने नव आरंभ।।
:- राम किशोर पाठक (शिक्षक/कवि)