ग़ज़ल 2122 2122 2122 212
ग़ज़ल 2122 2122 2122 212
तेरे मेरे बीच गो सूरज कभी छिपता न था,
पर उजाला ,मिलन में मुश्क़िलें करता न था।
सदियों से हम तरसे हैं अपनी मुहब्बत के लिए,
ये ज़माना दर्द मज़लूमों का कल सुनता न था।
वो सफ़र लंबा था हम थक भी चुके थे दोस्तों ,
तब मदद के पचड़े में इंसां कोई पड़ता न था।
जब चराग़ों से मुहब्बत करते थे हम लोग कल,
तब हवाओं के कबीले से मेरा रिश्ता न था।
ये सियासत बदजनों के हाथ की बांदी है अब,
खोटा सिक्का दौरे माज़ी में कभी चलता न था।
जब से मयखानों से साक़ी बेवजह गायब हुई,
तब से इस दिल में नशा मयखाने में चढ़ता न था।
गो मेरा चेहरा कभी भी दिखने में सुन्दर न था,
इतनी खामोशी से कोई आइना टूटा न था।
( डॉ संजय दानी दुर्ग -सर्वाधिकार सुरक्षित )