कविता : प्रिये
ओह प्रिये, तुम कितने प्रिय हो
तुम्हारी याद कितनी प्रिय है
तुमसे संबंधित प्रत्येक वस्तु अत्यंत प्रिय है
तुम्हारा नाम कितना प्रिय है
तुम्हारी आँखें, माथा, गाल, होंठ, ठोड़ी और
उन सबसे मिलकर बना रूप अनुपम है, अदभुत है
तुम्हारी आँखों में जो चमक है
वह कितनी प्रिय है, मनमोहिनी है
कभी दामिनी तो कभी प्रियदर्शिनी है