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15 Sep 2025 · 3 min read

*हिंदी दिवस पर कार्यक्रम में मुख्य अतिथि का दायित्व : धन्यवा

हिंदी दिवस पर कार्यक्रम में मुख्य अतिथि का दायित्व : धन्यवाद राजकीय रजा स्नातकोत्तर महाविद्यालय रामपुर

15 सितंबर 2025 सोमवार को राजकीय रजा स्नातकोत्तर महाविद्यालय के सेमिनार हॉल में हिंदी दिवस कार्यक्रम में मुख्य अतिथि का दायित्व निर्वहन करने का जो सम्मान प्राप्त हुआ, उसके लिए महाविद्यालय की प्राचार्या डॉक्टर जागृति मदान धींगड़ा जी तथा हिंदी विभागाध्यक्ष डॉक्टर प्रोफेसर अरुण कुमार जी को धन्यवाद देना मैं अपना कर्तव्य समझता हूॅं । हिंदी विभाग के प्रोफेसर डॉक्टर अब्दुल लतीफ जी का भी आभारी हूॅं, जिनके कुशल संचालन के कारण कार्यक्रम में वास्तव में चार चॉंद लग गए।

महाविद्यालय पहुॅंचने पर सर्वप्रथम हिंदी विभागाध्यक्ष डॉ अरुण कुमार जी से मुलाकात हुई और वह मुझे प्राचार्या कक्ष में ले गए। प्राचार्या जी से कुछ दिन पहले ही भेंट हुई थी। उस समय मैंने अपनी एक पुस्तक “हम कुंभ नहा कर आए हैं: राधेश्यामी छंद” उन्हें सादर भेंट की थी। प्राचार्या जी को वह भेंट स्मरण रही। प्राचार्या कक्ष में मनोविज्ञान विभागाध्यक्ष डॉ मीनाक्षी गुप्ता जी भी विराजमान थीं। प्राचार्या जी ने उन्हें बताया कि महाकुंभ को आधार मानकर रवि प्रकाश जी ने राधेश्यामी छंद की एक पुस्तक लिखी है। मैं अपने साथ अपना नवीनतम प्रकाशन “मुंडी लिपि में दोहे” पुस्तक ले गया था। मैंने मीनाक्षी जी और प्राचार्या जी को बताया कि इस बार हिंदी भाषा के क्षेत्र में यह एक अलग प्रयोग है, जो पुस्तक के रूप में प्रकाशित किया गया है। मैंने अरुण कुमार जी से निवेदन किया कि क्या प्राचार्या कक्ष में आप महानुभावों को यह पुस्तक भेंट करना उचित रहेगा? अरुण कुमार जी की राय थी कि सेमिनार हॉल में मंच पर पुस्तक का वितरण बेहतर रहेगा। इसी मध्य प्राचार्य जी ने पुस्तक के पन्ने पलट कर दोहों का अवलोकन कर लिया था तथा टिप्पणी की यह कोविड के समय किया गया कार्य जान पड़ता है। मैंने सहमति व्यक्त की और कहा कि कार्य पॉंच वर्ष पुराना है, प्रकाशन अब हुआ है। मृदु स्वभाव की धनी डॉ. मीनाक्षी गुप्ता जी साहित्यिक परंपरा से संबंध रखने वाली हैं। आपके पिताजी हिंदी के कवि और लेखक हैं।

सेमिनार हॉल में विद्यार्थियों की संख्या अच्छी-खासी थी। हॉल भरा हुआ था। छात्रों की तुलना में छात्राओं की संख्या अधिक थी। प्रारंभ में छात्र-छात्राओं के भाषण हुए। इसका विषय “हिंदी भाषा के विभिन्न अनुप्रयोग” था। एक छात्र देवेंद्र कुमार ने गुरुजनों के प्रति श्रद्धा-भावों को व्यक्त करती हुई एक कविता पढ़ी, जिसका शीर्षक था- गुरु न होते तो क्या होता? आप उपन्यासकार भगवान दास मोरवाल पर शोध कार्य कर रहे हैं।

कार्यक्रम में महाविद्यालय की प्राचार्या डॉक्टर जागृति मदान धींगड़ा, हिंदी विभागाध्यक्ष डॉ अरुण कुमार, डॉ सोमेंद्र सिंह, प्रोफेसर मुजाहिद अली शारीरिक शिक्षा विभाग, सैयद मोहम्मद अरशद रिजवी उर्दू विभागाध्यक्ष आदि ने हिंदी की स्थिति पर अपने विचार व्यक्त किये।

अंत में मुख्य अतिथि के तौर पर जब मुझे बोलने के लिए आमंत्रित किया गया, तब मैंने यही कहा कि प्राध्यापकों के अमूल्य विचारों से विषय पर पर्याप्त प्रकाश पड़ चुका है। कुछ अधिक कहने की आवश्यकता नहीं है। बस यह जानना पर्याप्त है कि 14 सितंबर 1949 को जब संविधान में हिंदी को राजभाषा बनाया जा रहा था; तब उसके क्रियान्वयन के लिए पंद्रह वर्ष का समय देना भयंकर भूल सिद्ध हो गई। उस समय जो वातावरण हिंदी के पक्ष में था, वह पंद्रह वर्ष के बाद कमजोर पड़ गया और अनेक कारणों से हिंदी का राजभाषा पद अनिश्चितकाल के लिए टलता चला गया। कुछ कार्य विशेष समय पर ही विशेष समयावधि में ही संपन्न हो सकते हैं। फिर भावनाओं का वह प्रवाह नहीं रहता है। हिंदी के साथ भी ऐसा ही हुआ।
भाषण की समाप्ति पर जब मैं मंच पर अपना स्थान ग्रहण कर रहा था, तभी एक छात्रा ने मुझसे काव्य-पाठ की फरमाइश कर दी। मेरा प्रसन्न होना स्वाभाविक था। उन्हें धन्यवाद। फिर मैंने राधेश्यामी छंद में एक कविता “हम अनुरागी अंतर्मन से, हिंदी की मीठी बोली के” पढ़ कर सुनाई ।

मेरा सौभाग्य रहा कि जिन अपेक्षाओं के साथ महाविद्यालय की प्राचार्या तथा हिंदी विभाग ने मुझे मुख्य अतिथि के पद पर आसीन किया था, उनके कथनानुसार मैं उन अपेक्षाओं पर खरा उतर पाया। ईश्वर से प्रार्थना है कि हिंदी की सेवा के कार्य में संलग्न रहने के लिए वह मुझे शक्ति प्रदान करते रहें।
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रवि प्रकाश, बाजार सर्राफा (निकट मिस्टन गंज), रामपुर, उत्तर प्रदेश
मोबाइल 99976 15451
[प्रबंधक: सुंदर लाल इंटर कॉलेज, रामपुर]

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