कवि- गोष्ठी
///// मस्तूरी : एक संस्मरण /////
मस्तूरी में काव्य रसिकों की कमी कभी नहीं रही है। मुझे याद है सन 1975 के बाद लगभग दशक भर तक साल में एकाध काव्य गोष्ठी होती रहती थी। अक्सर यह काव्य गोष्ठी आरक्षी केन्द्र के सामने पनभरिया तालाब पार स्थित प्राथमिक शाला भवन (वर्तमान में बी. ई. ओ. कार्यालय के हाल) में होती थी।
सबकी बैठक व्यवस्था जमीन पर होती थी। फर्क यह था कि श्रोताओं के लिए दरी बिछी होती थी, जबकि कवियों के लिए दरी के ऊपर सफेद कवर लगे गद्दे और तकिये होते थे। हम अपने साथियों की टोली के साथ अक्सर काव्य पाठ सुनने जाते थे।
वो बचपन का दौर था। हमें ज्यादा कुछ समझ तो नहीं आता था। लेकिन वाह- वाह की आवाज से लगता था कि कार्यक्रम अच्छा है। उस दौर में कवि गोष्ठी का कार्यक्रम शाम 6 से 8 बजे तक चलता था। उस समय ऐसे कार्यक्रमों में 30-40 की संख्या में श्रोतागण उपस्थित रहते थे। अनेक बार कार्यक्रमों की मुनादी कोटवार द्वारा भी कराई जाती थी। लेकिन पूरा कार्यक्रम माइक लेस होता था।
मेरी 66वीं कृति : मस्तूरी (एक संस्मरण) से…।
डॉ. किशन टण्डन क्रान्ति
साहित्य वाचस्पति
अमेरिकन एक्सीलेंट अवार्ड प्राप्त
हरफनमौला साहित्य लेखक