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15 Sep 2025 · 1 min read

देखकर अपनी हालत डर गया हूं मैं

समय से पहले घर गया हूं मैं,
देखकर अपनी हालत डर गया हूं मैं।

सूनी राहें, सूनी दरों दीवारें और सूना मन आंगन,
देखो अंदर से कितना मर गया हूं मैं।

बैठे बैठे सोचता हूं कि आखिर,
ये क्या कर गया हूं मैं,

नहीं जाता अब मयखाने और दोस्तों की महफ़िल में,
हां यार थोड़ा सा सुधर गया हूं मैं।

हँसते क्यों हो मुझपर,
सारे गमों से ऊबर गया हूं मैं।

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