करोना काल की एक घटना।
मित्रों अभी अभी एक मनोरंजक और कहें तो बिडम्बना पूर्ण घटना हुई। मैं अपनी पत्नी के साथ सब्जी खरीदने बाज़ार गया हुआ था। वापस लौटते समय देखा कि तकरीबन तीन चार युवतियां और युवक सड़क पर खड़े थे और उन आने जाने वालों को टोक रहे थे जिन्होंने या तो फेसमास्क ही नहीं पहना था या पहना था तो उचित तरीक़े से नहीं पहना था।
उनके टोकने पर कई लोग अपना मास्क उचित तरीके से लगा लेते थे या जिन्होंने पहना ही नहीं था वे पहन लेते थे। जिनके पास मास्क नहीं था वे लोग उन्हें मास्क प्रदान भी कर रहे थे। पर मास्क देते समय फोटो निकालना नहीं भूल रहे थे। मुझे अच्छा लगा कि कोई जनजागरण का कार्य कर रहा है। फिर मेरे ध्यान में आया कि वे लोग या तो साइकल सवार लोगों को समझा रहे थे या पैदल चलने वालों को ज्ञान दे रहे थे। मोटर बाइक वालों और कार वालों को रोकने टोकने का तो सवाल ही नहीं था।
पर पैदल चलने वालों में भी जो चाल ढाल और कपड़ों से संभ्रांत दिख रहे थे उन्हें वे लोग नहीं के बराबर टोक रहे थे। उनका ज्ञान लेबर क्लास वाले लोगों के ऊपर कुछ ज्यादा ही बरस रहा था। मुझे बहुत बुरा लगा।मैने ध्यान से देखा तो उस गुट के नेता का मास्क ही उसके गले में लटक रहा था। मेरे चेहरे पर तुरंत गुस्से और चिढ़ के भाव प्रकट हुए ।ज्यादातर पत्नियां राह चलते भिड़ंत करने से डरती हैं , मेरे हाव भाव देख कर मेरी अर्धांगिनी ने कहा चुपचाप घर चलो। पर मैं कहाँ मानने वाला था। मैं उस ग्रुप के पास गया।
मैं : भाई साहेब आप और आपका ग्रुप सबको समझा रहे हैं, मास्क बांट रहे हैं , अच्छा काम कर रहे हैं , पर आपने ही मास्क गलत तरीके से लगाया हुआ है। मास्क नाक के ऊपर होना चाहिए , आपका तो गले में लटक रहा है।
उस व्यक्ति को उसे टोकना अच्छा तो नहीं लगा किंतु उसने कुछ नहीं कहा अपना और अपना मास्क सही कर लिया पर ग्रुप की एक युवती कुपित हो गयी। और बदतमीज़ी की हद तक हो गयी।
युवती : मास्क पहना तो है , कभी कभी ध्यान नहीं रहता नीचे सरक जाता है , आप ऐसे “सरेआम” किसी को कैसे टोक सकते हैं।
मैं : क्यों नहीं टोक सकता , आप भी तो वही कर रही हैं, लोगों को मास्क का और उसे सही से कैसे पहनना है बता रही हैं , जब आपका नेता ही मास्क ठीक से नहीं पहनेगा तो आप लोगों की बातों का क्या असर होगा।
युवती : ज्यादा सयाना मत बन , जानता नहीं किसे टोक रहा है ?
मैं : जानता हूं , मैं भी लोकल ही हूं।
मैं आगे उससे कहने वाला था कि जब सुधार करने समाज में जाओ तो सिर्फ बातों से नहीं अपने व्यवहार से भी दिखाओ कि जो सबक तुम औरों को दे रहे हो उसका पालन तुम स्वंय भी कर रहे हो। पर मेरी पत्नी ने मुझे कुछ न कहने का इशारा किया और उस ग्रुप के एक युवक ने भी नम्रतापूर्वक मुझे शांत रहने का इशारा किया।
मैं इस घटना को इस तरह विस्तारपूर्वक क्यों लिख रहा हूँ ?
वो इसलिए की हमारे राजनैतिक दलों के अधिकतर नेताओं यही स्वभाव है। फिर यह बेमानी है कि वह कौन दल है ?
सभी दल इस सर्वगुणसम्पन्न होने की बीमारी से पीड़ित हैं।
उन्हें टोककर , उन्हें रोककर , उन्हें सही रास्ते पर लाना हम आम नागरिकों का कर्तव्य है।
Kumar Kalhans