क्यों मिलाएं हाथ..?
व्यंग्य
क्यों मिलाएं हाथ..?
हमारे हाथ की रेखाएं अलग हैं। पाकिस्तान की अलग। जबरदस्ती ठीक नहीं। हम क्यों हाथ मिलाएं? पहलगाम हमला हम भूले नहीं। पीड़ितों का दुख भूले नहीं। फिर क्यों हाथ मिलाएं? मैच खेलना था। खेल लिया। जीतना था। जीत गए। अब क्यों सवाल उठाते हो।
हमारी संस्कृति में हाथ मिलाना है ही नहीं। उनकी संस्कृति में भी नहीं। यहां नमस्कार या नमस्ते है। उधर सलाम या आदाब। अब हम से कहते हो…आ दाब। हमारे हाथों को। यह कोई बात हुई। विसर्ग संधि के कुछ नियम होते हैं। हम उसका पालन करते हैं। कैसे नियम तोड़ दें?
बशीर साहब का शेर है..कोई हाथ भी न मिलाएगा, जो गले मिलोगे तपाक से। यह नए मिजाज़ का शहर है, ज़रा फासले से मिला करो। हम यही कर रहे हैं।
हाथ मिलाना। घंटों मिलाना। यह अंग्रेजों की देन है। हम यह मानते रहे हैं कि इससे स्पर्श दोष आता है। जैसे ही हाथ मिलाया। रेखाएं टकराईं। शनि, गुरु इधर उधर हो गए। कई बार आपने देखा भी होगा। पक्की दोस्ती टूट जाती है। बचपन में भी कुट्टी होती थी। बोलचाल बंद। दोस्ती बंद। हम धमकी भी देते थे…वरना मैं कुट्टी कर दूंगा/ कर दूंगी। यानी बोलचाल बंद।
बड़े हुए तो हाथों का महत्व जाना। हाथ सिर्फ काम करने के लिए नहीं होते। हाथ मरोड़ने, हाथ तोड़ने और हाथ उठाने के लिए भी होते हैं।
हाथ की निश्चित लंबाई है। कई बार इनकी लंबाई बढ़ जाती है। यह पीठ पर डंक मारने लगते हैं। तब हाथ काटने पड़ते हैं। आस्तीन कमीज में इसीलिए होती है। सर्प छुप जाते हैं। हाथों की लंबाई पता नहीं लगती।
आ… दा… ब। नमस् …कार। दोनों को जितना चाहो खींच सकते हो। कोई स्पर्श दोष नहीं। कई हकले भी ऐसा प्रयोग करते रहते हैं। हाथ मिलाओगे तो फंस जाओगे। आपने हाथ मिलाया और उसने कह दिया…धुनाई मत करना। फिर आप मना नहीं कर पाओगे। यह इमोशनल कॉन्टैक्ट है।
क्रिकेट क्लेवर गेम है। क्रिकेट राजनीति है। या राजनीति में क्रिकेट है। कहना मुश्किल है। सर डब्ल्यू जी ग्रेस आउट नहीं होते थे। तब एक विकेट होता था। बॉल निकल जाती थी। अंग्रेजों के लिए हमने बहुत क्रिकेट खेली। रन हम बनाते थे। नाम उनका होता था।
किकेट तो हम द्वापर से खेल रहे हैं। बॉल यूं ही क्या नदी में चली गई? कृष्ण जी ने डंडा मारा चली गई। हाथों हाथ कालिया नाग का भी अंत हो गया। तब किसी ने नहीं कहा..हाथ मिलाओ।
हमारी क्रिकेट और उनकी क्रिकेट में अंतर है। उनको नहीं पता होता कि वो जीतेंगे। हमको हनरेड परसेंट पता होता है.. हम जीतेंगे। तभी यह तय होता है मैच खेलना है या नहीं ? राजनीति को हम अलग कर ही नहीं सकते। बैट और बॉल दोनों ही राजनीति के अंग है। जो बैटिंग करे। वो सत्तारूढ़ दल। जो बोलिंग करे वो विपक्ष। कवर ड्राइव लगाओ या स्क्वायर कट। पिटना बॉल को ही है। दूर दूर फील्डर हैं। जमाना छक्के का है। अब हम सिक्सर देखें या हाथ मिलाएं? खुद ही सोचो। हम तो चौक्का लगाने पर ग्लब्स मिलाते हैं। हाथ नहीं मिलाते। कोई भी मैच देख लो।
सूर्यकांत
15.09.2025