Sahityapedia
Sign in
Home
Your Posts
QuoteWriter
Account
15 Sep 2025 · 1 min read

वक्त

ढलती शाम ने हमें बताया वक्त नहीं है, लम्हों ने हमको समझाया वक्त नहीं है।

सब अपने अपने मसलों में ही उलझे हैं, औरों की ख़ातिर ज़रा सा वक्त नहीं है।

एक ही घर में रहने वाले साथ नहीं हैं, सबको ही है कार-ए नुमाया वक्त नहीं है।

भाग दौड़ इस दौर में तो हो गई ज़िन्दगी, जीने का अंदाज़ न आया वक्त नहीं है।

आपसे मिलने की हसरत है इक मुद्दत से, और आप ने ये फ़रमाया वक्त नहीं है।

सुबह हुई और शाम हुई सिलसिला यही, ढलती उम्र ने ये बतलाया वक्त नहीं है।

यादगार बन जाएं; ऐसा कुछ कर जाएं, अंत समय ये पड़े न कहना वक्त नहीं है।

जी भरकर जी लो “शमीम” हर लम्हे को, रह-ए-सफ़र अफ़सोस रहे ना वक्त नहीं है।

Loading...