#सामयिक
#सामयिक
चिंदी चिंदी अब हिंदी की।
उत्तरदायी हैं हम सब।
(प्रणय प्रभात)
“भाव स्थाई बचे, ना शेष संचारी रहे,
रस हुए नीरस निचोड़े जा चुके हैं इस तरह।
नाम वो ही हैं पुराने किंतु लक्षण सब नए,
भाव बदले, रूप बदले देखिएगा किस तरह।।
भक्ति रस बेबस हुआ पाखंड का पूरक बना,
वासना श्रृंगार रस में घुल चुकी है जानिए।
धौंस का पर्याय देखो बन चुका है वीर रस,
शांत रस केवल सुलह का भाव है ये मानिए।।
अब करुण रस धूर्तता की गोद में बैठा हुआ,
रौद्र रस आतंक का संकेत मानो बन गया।
लुप्त भय गुम भाव डर के अब तो यह रोमांच है,
रस भयानक सुप्त सा बेदम अचानक तन गया।।
नाम था अद्भुत, हुआ बेढब बिचारा इन दिनों,
कल का ये वीभत्स रस अब सुर्खियों में घिर रहा।
स्वार्थ की बैसाखियों पे आ टिका है वात्सल्य,
हास्य रस निर्लज्ज बन उपहास करता फिर रहा।।
लिंग भेदों को चुनौती अब कहानी नित्य की,
शब्द गुण दुर्गुण के पांवों के तले कुचले हुए।
शब्द की त्रय शक्तियों में यों हुआ है घालमेल,
भाव, अनुभावों विभावों के वसन मसले हुए।।
वर्तनी दूषित, प्रदूषित मात्राओं संग वर्ण,
शब्द छल तो वाक्य हैं घातो के हाथों अधमरे।
अर्थ की अर्थी उठी शब्दों की धरपकड़ी बची,
साधनों से पूर्ण युग में साधना भी क्या करे??
कोई अनुशासन नहीं अब ना ही अनुशीलन बचा,
शिल्प आहत देख के शैली बहुत हैरान है।
रूपकों ने रूप खोया, शील उपमा का गया,
शोक में उपमेंय दिखते, रोष में उपमान है।।
अब दुरभि हर संधि है, कैसी क्रिया क्या प्रतिक्रिया,
अब विशेषण तक बिचारे मोल अपना खो चुके।
लुट चुकी अस्मत अलंकारों की, भाषा रो रही,
व्याकरण के पृष्ठ सारे आज विकृत हो चुके।।”
#कथ्य
कविता केवल उनके लिए, जिनके लिए हिंदी का कुटुंब अपरिचित नहीं। शेष के लिए यह प्रयास भी अतिशेष या विशेष का अवशेष मात्र है।
संपादक
न्यूज़&व्यूज (मप्र)