कई बार हम उन रास्तों पर चल पड़ते हैं जिसे हमने नहीं, साथ चलन
कई बार हम उन रास्तों पर चल पड़ते हैं जिसे हमने नहीं, साथ चलने वाले ने चुना है और फिर साथ चलने वाले को एक रोज़ अचानक वो रास्ता पसन्द नहीं आता और वो चुपचाप बिना कुछ कहे मुड़ जाता है और आप छूट जाते हैं उन रास्तों पर जिसे आपने चुना ही नहीं था। फिर आपको समझ नहीं आता अकेले वापस लौटे या अब आगे भटकते रहे। जीवन सिर्फ़ स्वार्थ नहीं है, दायित्व भी है।
जब आप किसी को साथ चलने को कहें तो ख़्याल रखें कि या तो सफ़र पूरा करें या उसे बताएँ कि इन रास्तों पर चलना कठिन होता जा रहा है। क्या कठिन रास्तों के बीच बिछे कंकड़ों को साथ मिलकर हटाएँ या लौट चलें उसी पुगने बिंदु पर जहाँ से सफ़र की शुरुआत हुई थी ? वापस ठीक-ठीक लौटना तो नहीं होगा, पर अलग-अलग रास्ते चुन लेने में सहूलियत ज़रूर होगी। हमेशा ख्याल रखें कि उसने वो रास्ता इसलिए चुना क्योंकि आप चाहते थे।