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14 Sep 2025 · 4 min read

राज तो तुम्हारा है, फ़िर मैं आज़ाद कैसे

राज तो तुम्हारा है
फिर मैं आज़ाद कैसे ?

ये मन भी ना बड़ा ही मनचला है, बिल्कुल कवि जैसा। कहते हैं, जहाँ न पहुंचे रवि, वहाँ पहुंचे कवि। वैसे ही मानव मन भी ऊँची-ऊँची कल्पनाओं की उड़ानें भरता रहता है। हमारे प्रधान मंत्री जी भी गंभीर समस्याओं का समाधान मन की बातें सार्वजनिक कर ढूंढ लेते हैं। एक काउंसलर अथवा मनोचिकित्सक भी खोद-खोद कर पूछते हुए उलझी हुई गुत्थी को सुलझा लेते हैं। अपनी बात स्वतंत्रपूर्वक कहने का संवैधानिक अधिकार प्रत्येक नागरिक को प्राप्त है। विडंबना यह भी है कि अधिकारों का दुरुपयोग बेखौफ होकर खुले आम किया जाता है। इसका नज़ारा राष्ट्रीय संपत्ति, ऐतिहासिक धरोहरों, सार्वजनिक स्थलों आदि पर देखा जा सकता है। सामान्य जनता के साथ ही सत्ताधारी नेतागण तथा प्रशासनिक अधिकारी भी इससे अछूते नहीं हैं, अपवादों को छोड़ कर।
लेकिन आज़ादी मिलने के इतने वर्षो पश्चात भी हमारे देश की महिलाएँ अपने मन की बात खुल कर नहीं कह पाती हैं। हाँ, पाश्चात्य देशों में महिलाएँ अवश्य अपने मन की बात पति से कहने में कोताही नहीं बरतती। किंतु इसके परिणाम समाज में उभरती तू नहीं और सही वाली परंपरा में दृष्टिगोचर होते हैं। किंतु भारतीय महिला चाहे नौकरीपेशा, घरेलू या किसी भी वर्ग की हो, वह एक आदर्श पत्नी बनना चाहती है। अमूमन विवाह पश्चात वे पति के खाके में स्वयं को ढालने का प्रयास करती हैं।
बात यदि नारी स्वतंत्रता की करें तो किसी भी विवाहित नारी के अंतर्मन की तह तक पहुँच कर तो देखें… कईं अनकही बातें, बचपन से संजोई ढेरों अभिरुचियाँ, पसंदगी-नापसंदगी आदि की अलग-अलग पोटलियाँ करीने से सजी हुई मिल जाएँगी। तो कैसे कह सकते हैं कि एक नारी पूर्णरूप से आज़ाद है।
जो मन की बातें एक भारतीय नारी कह नहीं पाती, उन जज़्बातों को अल्फाजों में उतार तो सकती है…

पति के नाम पत्नी की पाती

सुनो जी,
प्यार भरी लंबी उम्र…
और क्या लिखूं ? प्रिये या प्रियतम के नाम से कभी पुकारा ही नहीं। हाँ, पाती लिखने ही बैठी तो आज सारी दिल की बातें लिख ही दूँगी।
आप बहुत अच्छे हैं,अरे यह ‘आप’ संबोधन तो मेरे लिए दीवार ही बन गया है। आज तो मैं ‘तुम’ ही लिखूंगी, चाहो तो बुरा मान जाना, और क्या ?
अच्छा जी,तुम मेरे परिवार वालों को तुम्हारे माँ-पापा,तुम्हारे भाई-बहन या तुम्हारे रिश्तेदार कह कर क्यूँ बुलाते हो ? मैंने तो कभी भेदभाव नहीं किया। इस घर में आकर मैंने सबको अपना बना लिया, उस घर को भुलाकर। आगे से तुम भी ऐसा ही करोगे तो मुझे बहुत सुकून मिलेगा। अगर तुम्हारा परिवार मेरा तो मेरा परिवार भी तुम्हारा हुआ। ठीक है न।
हाँ, मानती हूँ, मुझे दिल से चाहते हो और मेरे लिए मंहगी सौगातें लाना कभी नहीं भूलते हो। परंतु कभी सोचा या पूछा है मेरी पसंद के बारे में, कभी नहीं। मुझे हलकी-फुलकी कॉटन सिल्क या शिफॉन की साड़ियां वो भी हरे, गुलाबी कासनी, प्याजी रंगों में पसन्द है। इनकी प्लेट्स, फॉल आदि आसानी से सेट हो जाती है। तुम तो भारी भरकम लकदक गहरे रंगों की कांजीवरम, बनारसी साड़ियों में मुझे किसी शोरूम का बुत बना देते हो। बताओ भला कितना असहज हो जाती हूँ ,सोचा है कभी ?
शिकायत का पिटारा खोला है तो यह भी बता देती हूँ किचन पर मेरा अधिकार, यह तो जानते ही हो। लेकिन सारे आइटम्स तुम्हारी पसंद के। ठीक है तुम्हारा साथ देने के लिए छोले, मटर-पनीर आदि खा लेती हूँ बेमन से। कभी तो हींग-जीरे से बघारी तुअर की दाल या अदरक-हरी मिर्च के तड़के वाली मोगर मूंग दाल,भरवाँ गिलकी, तुरई के छिलके की बेसन-तिल की चटनी, मैथी -आलू, कड़ी पकौड़ा भी मेरे खातिर चख लिया करो।
और हाँ, यूँ तो तुम मेरे बनाए व्यंजन चटकारे ले-ले कर खाते हो, पर मेहमानों के सामने नुस्ख निकालना नहीं भूलते। जब कि सभी मेरे खाने की तारीफ़ ही करते हैं। शायद यही सुनने के लिए नुस्ख निकालते हो। अपने मन की खिड़की कभी तो खोल दिया करो।
अरे हाँ,कभी-कभार हमारे घर की सजावट, परदे के रंगों आदि के बारे में मेरी राय लेने में क्या जाता है तुम्हारा, बोलो।
हमेशा धूम-धड़ाके वाली सस्पेंस मूव्ही ही दिखाते हो। चलो तुम्हें अंग्रेजी मूव्ही व हेमा-धर्मेद्र पसंद है। पर मेरे खातिर कभी मिली, उपहार, जंजीर जैसी फिल्में दिखा कर जया-अभिताभ से भी मेरी मुलाकात करा दिया करो। हूँ उ उ, यूँ भी चेंज के लिए कभी किसी कविता, गज़ल-शायरी या संगीत के कार्यक्रम में भी जा सकते हैं।
देखो जी, बातें बहुत हैं लिखने को, अब फिर कभी लिखती हूं। माफ़ करना मेरी गुस्ताख़ी। बुरा भी मत मानना, दिल के गुबार और किसे बताती भला ?
तुम भी चाहो तो कुछ लिखना ज़रूर। वैसे तुम बहुत अच्छे हो।
प्यार सहित…
सदा तुम्हारी अपनी

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