मन के रावण कोई जला दो
मन के रावण को जला दो
श्री राम ने त्रेतायुग में दशानन का संहार कर दिया था। फ़िर क्यों हम प्रतिवर्ष रावण दहन करते हैं ?
पापी मर गया किंतु उसके पाप आज भी जिंदा हैं। राम प्रतीक हैं अच्छाई के, रावण है बुराई का। दशानन के पाँच सिर पुरुष के तथा शेष पाँच सिर स्त्री के विकारों को दर्शाते हैं।
प्रथमतः हमें मन के विकारों काम, क्रोध, लोभ, मोह व अहँकार का त्याग करना होगा । वरना रावण का पुतला हर वर्ष जलाना होगा। तो क्यूँ न इन विकारों का ही दहन कर दें? ‘न रहेगा बांस, न बजेगी बाँसुरी’ कहावत शत प्रतिशत लागू होती है।
क्यूँ प्रति वर्ष रावण-दहन कर मात्र एक परम्परा निभाते रहें। बेहतर है, पाप से घृणा करो, पापी से नहीं।
रावण को जलाने के बजाय टटोले अपने मन को। क्या-क्या बुराइयाँ हमने जमा कर रखीं हैं ? दीपावली के पूर्व हम घर की सफाई करते हैं। अपने काम की वस्तुएँ सहेज कर बाकी कबाड़ा, अटाला समझ कर निकाल बाहर करते हैं। बेकाम की चीजें फेकने के बाद घर की सुंदरता बढ़ने के साथ मन में भी हल्कापन अनुभव करते हैं। यही हाल है हमारे मन का।
हर आत्मा अर्थात व्यक्ति में मन, बुद्धि व संस्कार तीन शक्तियाँ होती है। मन का कार्य है सोचना। एक मिनिट में कई सौ विचार आते हैं। मन की सोच हमारी वाणी व्यक्त करती है। तदनुसार हम कर्म करते हैं। अच्छे या बुरे कर्म के आधार पर ही हमारे चरित्र का निर्माण होता है. अतः सर्वप्रथम मन की सोच शुद्ध अथवा निर्विकारी रखना चाहिए।
नकारात्मक सोच से चंचल मन में रावण वाली बुराइयाँ घर कर लेती हैं। फ़िर तन की कितनी भी सफ़ाई करते रहो, मन तो विकारी ही रहता है। हाँ, तन निर्मल तो मन उपवन बन जाता है। उपवन में हम वन से इतर महकते फूल ही उगाते हैं। अत: सर्वप्रथम मन के रावण को जलाना अति आवश्यक है क्योंकि दर्पण कभी झूठ न बोले। मुँह में राम व दिल में छुरी हो तो शहद में सनी वाणी भी धोखा दे देती है। मन की बात जुबाँ पर आए बिना नहीं रहती। दुआ भी सच्चे दिल से निकली हुई ही कुबूल होती है। बुजुर्ग कहते भी हैं न अच्छा सोचो तो अच्छा होगा।
भारतीय सनातनी परम्परा है पाठ-पूजा करने की। जीवन में कितने भी संकट हो, पूजा के समय हम शुभ ही सोचते और वैसा ही भगवान से मांगते हैं। अत: मन के मैल को धोकर ही हम पाक-साफ़ हो सकते हैं।
कई बार मन की सच्चाई व ईमानदारी भी स्वर्ण पदक से बड़ा पुरस्कार बन जाती है। कतर के धावक को अपने पदक से ज्यादा चिंता गिरे हुए साथी खिलाड़ी की थी। यही बात उसे विख्यात कर देती है। आज भी कौरवों की कुटिलता से अधिक अभिमन्यु की वीरता याद की जाती है।
रावण जलाया जाता है और राम की पूजा की जाती है। गुप्त जी ने सही कहा है… वह हृदय नहीं पत्थर है बहती जिसमें रसधार नहीं। अत: मन को कचरापेटी नहीं वरन मंदिर जैसा बनाना चाहिए ।
गन्दगी बुहारेंगे तभी स्वच्छता आएगी। जैसा कर्म करेंगे वैसा फल पाएंगे और जैसा सोचेंगे वैसा ही हम बन जाएंगे। अत: शांति से गन्दे पानी से भरे ग्लास में बस निर्मल जल डालते जाइए, पूरा पानी स्वच्छ हो जाएगा। जी हाँ, रावण का स्थान राम ले लेंगे।
सरला मेहता
इंदौर