*लोग क्या कहेंगे*
लोग क्या कहेंगे
एक कहानी सुनी है… एक धोबी कपड़ों का गट्ठर लिए अपने गधे पर सवार होकर जा रहा था। लोग कहने लगे, “बड़े स्वार्थी हो, बोझे के साथ खुद भी ऐसे मरियल गधे पर बैठ गए। दुनिया में दया बची ही नहीं।”
बेचारा धोबी गट्ठर सिर पर रख गधे के साथ चलने लगा। एक राहगीर ने तंज कसा, “देखो इस बेवकूफ को बोझा खुद ढो रहा है। जैसे गधा इसका मालिक हो।”
कहने का तातपर्य यह कि दुनिया में कैसे भी रहें, लोग बातें बनाने से नहीं चूकते। चट भी अपनी और पट भी अपनी।
“कुछ तो लोग कहेंगे, लोगों का काम है कहना”
तो क्यूँ न हम अपने मन के मालिक बने। हाँ, सुने सबकी व करें मन की। लेकिन सबकी राय अवश्य जाने। कई बार भिन्न-भिन्न अभिमतों से जो सार निकलता है, वह सर्वश्रेष्ठ होता है। स्वामी विवेकानन्द स्वयं भ्रमित थे। उन्होंने सारे धर्मों के ग्रंथों का गूढ़ अध्ययन किया। प्रत्येक धर्म की अच्छी बातें लेकर ही वे एक निष्कर्ष पर पहुँचे थे। अतः समूह या समुदाय में रहते हुए सभी के तर्क-वितर्क सुनकर ही अंतिम निर्णय लिया जाता है। सदन की कार्यवाही भी पक्ष व विपक्ष दोनों की सहमति से चलती है। प्रारम्भ से ही सलाहकारों की परंपरा रही है। अतः लोगों को कहने दीजिए, अपना काम हमें स्वयं ही करना है। कहते हैं न हाथी निकले बाज़ार, श्वान भोंके हज़ार।
महाभारत का भी एक किस्सा याद आया…
द्रोपदी चीरहरण के समय भीष्म चुप रहे। कारण वे कौरवों के पक्ष में थे। ग़लत बात का विरोध नहीं करना भी अन्याय है। राम ने एक धोबी के कहने पर पाक साफ़ सिया को सज़ा सुना दी।
लोगों की कही बातें सुन कर ऐसे नीतिविरुद्ध फैसलें लेना कहाँ तक उचित या धर्म सम्मत है।
इसतरह परिवार में, भाइयों में भी फूट पड़ जाती है। आँखों से देखा ही सत्य है। कानों से सुने पर विश्वास करना मूर्खता है। कहने दो लोगों को। हंडिया पर ढक्कन लगा सकते हैं लोगों के मुँहों पर नहीं।
सरला मेहता
इंदौर