कुटुंब व्यवस्था... विलुप्ति की कगार पर
कुटुंब व्यवस्था…
विलुप्ति की कगार पर
वसुधैव कुटुंबकम के सिद्धांत का उल्लेख भारतीय दर्शन के अनुसार महाउपनिषद में मिलता है।
वसुधैव कुटुंबकम का अर्थ है एक सार्वभौमिक परिवार जिसका अस्तित्व सीमाओं, भाषाओं व परम्पराओं से परे है। अर्थात एक पृथ्वी, एक परिवार। एक प्रेरक गीत याद आ रहा है… ‘सबका मालिक एक फ़िर क्यूँ बँटा हुआ संसार है, सच पूछो तो सारी दुनिया अपना ही परिवार है।’
भारत के इतिहास पर गौर करें तो पाएँगे कि संयुक्त परिवार हमारी परम्परा रही है। हालाँकि शिक्षा का प्रसार इतना नहीं था किन्तु स्तर ऊँचा था। शिक्षा में संस्कार भी समाविष्ठ थे।
घर के बुजुर्गों के सुझाव व आदेश पत्थर की लकीर होते थे। दादा-दादी की देखरेख में पले-बढे बच्चे विनम्र व सहयोगी होते हैं।
पुरातन काल के परिवारों में अमूमन पीढ़ी दर पीढ़ी पुश्तैनी धंधे करने की ही परिपाटी थी।
अंग्रेजी भाषा की शिक्षा ज्ञान-प्राप्ति तक ही ठीक है। अंग्रेजीयत में पूरी तरह ढल जाना यानी महात्वाकांक्षाएँ घोड़े पर सवार होने लगती हैं। आधुनिकता की अंधी दौड़ में विदेशों में जाकर शिक्षा प्राप्त करना और नौकरी कर वहीं बस जाने की तमन्ना रहती है। आज स्थिति यह है कि कईं भारतीय बच्चे विदेशों में बस गए हैं। वहीं उनके अपने परिवारों का भी गठन हो गया है। नतीजन हमारे देश के मोहल्लों में कईं घर ऐसे हैं जिनमें परिवार के नाम पर बुजुर्ग दम्पति ही रहते हैं।
अपवाद स्वरूप आज बेटियों की उच्च शिक्षा भी परिवार के विघटन का कारण बन गई है। नौकरी व फैशन के पीछे बावली लड़कियाँ बगैर किसी दबाव के स्वतन्त्र रहना चाहती हैं। यही नहीं कईं अपने जीवनसाथियों से ही ताल-मेल नहीं बिठा पाती हैं। फ़िर उनका सास-ससुर, जेठ, देवर के साथ रहना तो असम्भव ही है। इसके कईं अवांछित परिणाम भी सामने आ रहें हैं।
संयुक्त परिवारों के टूटने के कईं कारण हैं :—
*परिवार धीरे-धीरे बिखरने लगे। अब होली-दिवाली का मिलन भी सोशल मिडिया पर हो जाता है।
*जीवन की आपा-धापी में हर कोई व्यस्त है… अपनी ढपली, अपना राग। भाईचारा, सहयोग आदि मूल्य बस किताबी रह गए, किताब से रट कर परीक्षा पास करने के लिए।
मूल्यों की शिक्षा इस तरह दी जाना चाहिए कि व्यवहार में आ जाए।
*प्रचार, प्रसार व संचार के साधन बढ़ गए हैं लेकिन प्रेम-भाव नदारद। आभासी दुनिया से विघटन, मनमुटाव आदि रिश्तों में भी घुल गए हैं।
*आज के मशीनी युग में रिश्ते भी यन्त्रवत हो गए हैं। ग्राम-क़स्बों से शहर की ओर विस्थापित युवा वर्ग अपनी परम्पराओं से दूर हो गए हैं। भरा-पूरा परिवार संस्कार सीखने की प्रथम पाठशाला है। सोशल मीडिया की लत ने नौनिहालों की रातों को दिन में बदल दिया है। पूजा-पाठ, ज्ञान-ध्यान का स्थान देर रात वाली पार्टिज ने ले लिया है। कोरोना महामारी ने अवश्य एक नई राह दिखाई थी। किन्तु फ़िर वही ढाक के तीन पात। ऐसे में तीन पीढ़ियों में से पहली पीढ़ी के सदस्य भी अकेले ही रहना चाहते हैं।
कुटुंब में बिखराव को रोकने के लिए परिवार की प्रथम इकाई से ही प्रयास करना होगा। बाल मनोविज्ञान के अनुसार आठ वर्ष तक बच्चे में सीखने की प्रक्रिया उच्चतम स्तर की होती है। इस आयु में जो भी सिखाया जाता है, वह जीवनपर्यंत याद रहता है:—
*शैशव काल में बच्चा गीली माटी के समान होता है। जैसा चाहो, उसे वैसा ढाल लो। अतः घर के वातावरण पर निर्भर करता है। ऋषि का तोता श्लोक उच्चारता है जबकि डाकू के घर पल रहा तोता गालियाँ बोलता है।
*बच्चे को कार नहीं संस्कार दो। साथ ही अच्छी संगति भी।
*अम्बानी जैसा महात्वाकांक्षी तो हो पर टाटा जैसा परोपकारी भी हो।
अतः भारतीय सनातनी परम्पराओं का परिपालन ही कुटुंबों को टूटने से बचा सकता है।
सरला मेहता
इंदौर