*गर्भ संस्कार की उपादेयता* भाग (2)
गर्भ संस्कार की उपादेयता
भाग (2)
यह भी मान्य तथ्य है कि प्रसव के पूर्व ही बच्चे में सुनने,देखने व समझने की शक्ति तथा सामर्थ्य साठ प्रतिशत तक विकसित हो जाती है, सामान्य तौर से। वह गीत-संगीत के स्वरों के प्रति संवेदनशील होने लगता है। अतः भड़काऊ, कानफोडू आवाजें तो विपरीत प्रभाव डालेगी ही।
बच्चे का मानसिक और शारीरिक पोषण माँ के आचार-विचार व व्यवहार पर निर्भर करता है। जैसे गरिष्ट तला-गला भोजन पाचनतंत्र के लिए हानिकारक है, वैसे ही माँ के गलत आचरण का प्रभाव भी गर्भस्थ शिशु पर पड़ता है। अतः डरावने व मारधाड़ वाले दृश्य, नशा व धूम्रपान आदि व्यसनों से तो गर्भवती महिला को तोबा करना ही चाहिए। जहाँ तक संभव हो सहज-सरल, शांतचित रहें। तथा राग-द्वेष व परनिंदा, नुक्ताचीनी, कलह, विवाद, मनमुटाव आदि से परहेज करें। स्वयं से बातें कर आत्मचिंतन करे। मन में प्रफुल्लता भरने वाली बातें तथा घटनाएँ स्मृति में लाएँ। और दुख व निराशा लाने विचारों का मनन नहीं करें।
हाँ,ये बात भी सही है कि माँ की स्वयं की भी अपनी पसंद व नापसंद होती है। किंतु संतान के लिए यह त्याग फ़ायदे का सौदा ही होगा। स्वस्थ चरित्रवान संतान पाकर उस घाटे की पूर्ति भी हो जाएगी। माँ एक सुघड़ गृहणी भी होती है। आदर्श गृहणी के लिए कहावत है…मुझे नहीं मेरे घर को देखो। और एक आदर्श माँ कहती है, “सबसे पहले मेरी संतान को देखो, फ़िर मेरे घर को देखो और अंत में मुझे देखो। हाँ अगर मुझे नहीं देखो तो भी चलेगा।”
आज की माँएँ ख़ुद को सँवारने-सजाने, अपने व्यक्तित्व को निखारने को प्राथमिकता देती हैं। बुरा न मानिएगा, सब के लिए नहीं कह रही हूँ। और अपवाद तो हर किरदार में होते ही हैं। माँ को अपने हुनर का सदुपयोग अपनी संतान के व्यक्तित्व निर्माण के लिए अवश्य करना चाहिए, गर्भकाल से ही। वह हुनर या काबिलियत किस काम की जो अपने ही जिगर के टुकड़े को लायक तथा काबिल नहीं बना सके।
अविरत… भाग (3)
सरला मेहता
इंदौर