सियाह रात में क्यों ग़मों ने अपने चराग़ जलाए है।
सियाह रात में क्यों ग़मों ने अपने चराग़ जलाए है।
बड़ी मुश्किल से हमने दर्द अपने ज़माने भर से छुपाए हैं।।
मग़र रात हंस कर के मेरे दर पे दस्तक आ कर सुनाए हैं।
हम है तुम्हारे अकेलेपन के साथी इसलिए तुम को सताए है।।
मधु गुप्ता “अपराजिता”