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14 Sep 2025 · 3 min read

धुंधला होता रंग

धुँधला होता रंग

भारत की परंपराओं में पान का अपना विशिष्ठ स्थान है। किंतु शनै-शनै हमारी यह ख़ास पहचान विलुप्ति की कगार पर है। मुख्य कारण है मुखवास के नए-नए साधनों का प्रचलन में आना। आजकल कईं तरह के पान-मसालों व गुटकों आदि से बाज़ार पटा पड़ा है।
एक ज़माने में प्रत्येक घर में एक पीतल या चाँदी का पाँच सात खानों वाला अदद पानदान हुआ करता था। लौंग, इलायची, सौंफ, सुपारी, पिपरमिंट, जायत्री, गुलकन्द आदि भरे रहते थे। कत्था व चूनादानी अलग से होती थी। और गीले कपड़े में लिपटे पान पंडेरी पर मटके के साइड में रखे रहते। भोजनोपरान्त सबको प्यार से पान खिलाया जाता था। इस कार्य का दायित्व घर के बुजुर्ग निभाया करते थे।
हाँ, चाय का रिवाज़ नहीं होने से मेहमानों का स्वागत भी पान से होता, पान बहार से नहीं। दशहरे का त्यौहार तो बगैर पान-बीड़ों के मनाया ही नहीं ज़ा सकता था।
पान की हमारी परंपरा विश्व में भी छाई हुई है। कहीं भी चले जाओ पान-बीड़ों का सजा सजाया काउंटर मिल ही जाएगा, विशेषकर हॉटल्स और भोजनालयों के आसपास।
धार्मिक क्रिया-कलापों में पान की प्रमुखता रहती है। प्रथमपूज्य गणेश को इसी पर विराजित कर पूजन प्रक्रिया प्रारम्भ होती है। पूजा व शुद्धि हेतु पात्र से जल, पान से छिड़का जाता है। पान-बीड़ा
भोग में रखा जाता है, विशेषकर देवी माँ के । इस तरह पान हमारे कईं रस्मों-रिवाजों से जुड़ा हुआ है।
विवाह में दूल्हे के कुंवर-कलेवे में पान-बीड़े की अनुपस्थिति बखेड़ा कर देती है। दुल्हन के कान में सीख देने वाली सुहागिनों को पान-बीड़ा दिया जाता है। बिना पान के सुहागरात भी अधूरी है।
आदिवासियों के भगोरिया उत्सव में यह दो दिलों को मिला देता है। हाँ, प्रणय-निवेदन का साधन भी है यह।
अच्छे स्वास्थ्य के लिए यह रामबाण औषधि है। दादी-नानी द्वारा प्रतिपादित यह सेहत का अचूक नुस्खा है। पाचन-क्रिया नियंत्रित होकर मुँह का स्वाद मधुर हो जाता है। चूना, कैल्शियम का बड़ा स्त्रोत है। सुपारी को छोड़ कर पान के सभी घटक अपनी विशेषता लिए हुए हैं। नज़ला खाँसी में लौंग, जायत्री, केसर का पान फ़ायदा करता है। कभी प्रसूताओं को भी सुआ, केसर, अजमाइन, जायत्री आदि वाला पान दिया जाता था। श्राद्धभोज के पश्चात दक्षिणा के साथ आज भी पान-बीड़े दिए जाते हैं। यह भी कहा जाता है कि गर्भवती स्त्री पान-बीड़े के सेवन से रूपाली संतान प्राप्त कर सकती है।
धीरे-धीरे पान को भी प्रदूषित किया जाने लगा। व्यसन-परस्ती ने इसे ड्रग्स व तम्बाखू आदि का साधन बना दिया। भारतीय अभिभावककों का यह ख़ास जुमला या तकिया अलाम है। अपने बच्चों को कहने से नहीं चूकते हैं, “पढ़ लो बच्चू, वरना सब्ज़ी का ठेला दिला दूँगा या पान की दुकान पर बैठा दूँगा।”
पान की दुकान लगाने वालों को समाज में हेय दृष्टि से देखा जाता है। लोग यह नहीं जानते कि पान का धंधा भी वारे न्यारे कर सकता है। कह नहीं सकते कि वक़्त की मार झेलता यह सीधा-सहज सा व्यवसाय विदेशों में झंडे गाड़ने लगे। जैसे रामदेव बाबा योगा के पक्ष में आगे आए, ऐसे ही पान के पक्षधारियों की भी सख़्त ज़रूरत है। इससे अच्छा स्टार्टअप धंधा तो हो ही नहीं सकता है। कृपया सरकार ध्यान दे।
वर्तमान में यह एक ठंडी बयार का झोंका है कि घर-घर में पान की बेलें पनप रही हैं। करोड़ों की शादियों में एक अदद पान स्टॉल के दर्शन होने लगे हैं, जो निरन्तर अंत तक खूब चलते हैं।
यह कहना अतिशयोक्ति नहीं होगी कि दादी-नानी के द्वारा प्रतिपादित यह सेहत का अचूक नुस्खा है। क्यों न महिलाएँ अपने विवाह-उपहारों में मिले पानदान अब निकाल ही लें।

सरला मेहता
वामा साहित्य मंच
इंदौर

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