जीवन में ख़ुशी की अनुभूति
.*जीवन में ख़ुशी की अनुभूति*
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साधारणतया देखा जाए तो मानव-जीवन एक पहेली है। जिसने इस पहेली को बूझ लिया, वही सुखी है। किंतु साथ ही यह चुनौती भी है। ज़िन्दगी फूलों की सेज नहीं है। इसमें कईं टेढ़ी-मेड़ी, उबड़-खाबड़, काँटोंभरी पगडंडियाँ भी हैं। जो इन्हें पार कर लेता है, वही सिकंदर है।
हर किसी का दामन खुशियों से भरा नहीं होता है… कभी पूनम की चाँदनी तो कभी अमावस की स्याह रातें। रात्रि कितनी भी अँधेरी क्यूँ न हो,भोर अवश्य होती है। सुख-दुःख की आँख-मिचौनी तो चलती रहती है। फ़िर क्यूँ न काली डरावनी रात में भी ख़ुश रहें। भोर की लाली की प्रतीक्षा भर तो करना है। चाहे दुखों की घनेरी घटा छा जाएँ, बादलों को तो छटना ही है।
गीता का भी यही संदेश है… जो हुआ अच्छा हुआ, जो हो रहा अच्छा हो रहा है और जो भी होगा अच्छा ही होगा। एक राजा अपनी खंडित ऊँगली के लिए बड़ा मायूस। किंतु उसी ऊँगली की बदौलत वह बलि चढने से बच गया। हर बात में कल्याण छुपा है। यही तो है ख़ुशी का मर्म। ख़ुशी का हर हाल में कायम रहना ही गमों से निजात पाने की संजीवनी बूटी है। सच ख़ुशी जैसी कोई अन्य औषधि नहीं है। बस खुशियाँ बाँटो और खुशियाँ पाओ। दुवाएँ दो और दुवाएँ लो।
सामान्यतः ख़ुशी का पैमाना है अधिक से अधिक सुख-सुविधाएँ जुटा कर और धन-संपन्न होना। लेकिन ये इच्छाएँ, ये महत्वाकांक्षाएँ सरपट घोड़े पर सवार होती हैं। एक लालसा पूरी हुई नहीं कि दूसरी तैयार हो जाती है। लेकिन जब संतोष रूपी अनमोल धन हाँसिल हो जाता है तो अन्य सब धन धूल समान। संतोषी सदा सुखी। अंग्रेजी में कहावत है… Be satisfied with what you have but not with what you are. तो क्यों न स्वयं के व्यक्तित्व को कभी नहीं खुटने या समाप्त होने वाले सद्गुणों से सजा लें। नश्वर भौतिक चीजों के पीछे क्यों भागे? इससे मात्र क्षणिक ख़ुशी ही नहीं अपितु असीम आत्मीय आनंद की प्राप्ति होती है।
निस्वार्थ भाव से किसी निर्धन को मदद व सहयोग देना भी अपार ख़ुशी की अनुभूति करा देता है। एक साधारण सी ज़िन्दगी जीने वाले कुबेर जैसे धनिक आदरेय टाटा ने सदा जनसामान्य की खुशहाल ज़िन्दगी के लिए सस्ती सामग्री व उपकरण इजाद कर बाज़ार में उपलब्ध करवाए। सस्ती नैनो कार एक सीमित साधनों वाला व्यक्ति भी खरीद सकता है। उदारमना उद्योगपति टाटा को इन्हीं कार्यों में असीम आनंद की अनुभूति होती थी।
ख़ुशी अनुभूत करने का श्रेष्ठतम उपाय है सादा जीवन, उच्च विचार। जिन्हें खूबियाँ ख़ुद ख़ुदा ने बख्शी हो, ऐसे व्यक्ति किन्हीं जेवरात के मोहताज नहीं होते हैं। सादगी पसंद मेरे महात्मा स्वरूप पिताश्री कहा करते थे… फ़टी पोषाक को सिल लो और रूठे व्यक्ति को मना लो। ख़ुशी एक मनोगत भाव है, एक आभासी विचार है। अतः ख़ुशी की अनुभूति भी सदविचारों से ही हो सकती है।
सरला मेहता
इंदौर
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