गणेश चतुर्थी... कल और आज
गणेश चतुर्थी…
कल और आज
आध्यात्मिकता भारत की पहचान है। हमारे भारत के सावन-भादव माहों की तो पूछिए मत। यदि कल की बात करें तो अंतर्मन की गहराइयों से देवी-देवताओं को पूजा व याद किया जाता था। आज के ज़माने में इस धार्मिक भावना के साथ दिखावा व धूमधाम भी जुड़ गया है।
चतुर्थी को शुभ मुहुर्त में गणेश स्थापना की जाती थी। विनायक की मूर्ति, मिट्टी से घर पर ही बना लेते थे या बाजार से लाते थे। अपने अपने घरों में श्रद्धा-भक्ति से पूजन आरती करते व मोदक का प्रसाद चढ़ाते।
पराधीन भारत में हमारे देशभक्त नेता किसी भी बहाने से संगठित होना चाहते थे । अपनी बात व गुप्त सन्देश जनसामान्य को पहुँचाना चाहते थे। फिरंगी नहीं चाहते कि लोग एकत्रित होकर विद्रोह की, क्रांति की योजना बनाए। हमारे बालगंगाधर तिलक अखबार तो निकालते ही थे। अब उन्हें गणेश पूजा के बहाने लोगों से मिलने की युक्ति सूझी। और सार्वजनिक गणेशोसत्व मनाए जाने लगे। चतुर्थी से अनन्त चतुर्दशी तक बड़ी धूमधाम से बप्पा की पूजा के साथ आज़ादी की चिंगारी भी सुलगाई जाने लगी। ग्यारवें दिवस बप्पा की विदाई होती थी। हाँ, यह विसर्जन करने का कोई रिवाज़ नहीं था। कहते हैं एक बार गजानन महाराज का मुम्बई में स्वागत हुआ था। फ़िर उन्हें वहीं विसर्जित कर दिया गया। तभी से यह परिपाटी बन गई।
आजकल तो बस लोगों को मौज-मस्ती करने का बहाना चाहिए। पूर्व से चंदा एकत्रित कर बड़ी सी गणेश प्रतिमा की सजे हुए पांडाल में स्थापना की जाती है। पूजा-अर्चना व प्रसाद-वितरण के पश्चात कई प्रतियोगिताएँ सम्पन्न होती हैं। देर रात तक ढोल-धमाका तथा नृत्य चलते हैं। असामाजिक तत्व ऐसे मौकों की तलाश में ही रहते हैं।
पूजा के साथ अन्य प्रपंचों का भी प्रचलन जोरों पर हो रहा है। बड़ी-बड़ी प्रतिमाएँ जो प्लास्टर ऑफ पेरिस या अन्य पदार्थो से बनने लगी हैं। इन्हें विसर्जित किया जाता है पावन नदियों में। जल प्रदूषण के साथ आचार-विचार भी प्रदूषित हो रहे हैं। कई बार नशे में झूमती युवा पीढ़ी हादसों का शिकार भी हो जाती है। क्यूँ न अपने पूजाघरों में विराजे गणु बप्पा को ही स्थापित कर पूजा कर उन्हें घर में ही जल पात्र में विसर्जित करें ? इस प्रकार बप्पा का अपमान भी नहीं होगा।
पूजा, मन से की जाना चाहिए। जिन आराध्य को पूजते हैं, उनके गुणों को धारण भी करना है। गजानन के तो अंग-प्रत्यंग प्रतीकात्मक हैं, प्रेरक सन्देशों के ख़जाने हैं।
गणु देते हैं सन्देश
जयति जयति हे गणपति देवा
मस्तक प्रशस्त बुद्धि के हैं दाता
दूरदर्शिता, दिव्य-नयन समाता
कर्ण विस्तरित, दुःखों के ज्ञाता
मध्य विशाल, उदारता दर्शाता
एक व नेक बने,एकदंत कहता
कुल्हाड़ी करे ,संहार दुर्गुणों का
रस्सी से मर्यादित कर्म है आता
कमल कीच में, ये न्यारा रहता
मोदके-दाने हैं,संगठित एकता
शिव-गौरा सुत, प्रथम पुजाता
पितु-मात में, सर्व ब्रह्मांड पाता
मूषक-सवारी, दुर्गुण ये दबाता
रिद्धि -सिद्धि, शुभ-लाभ लाता
कृपा करो हे! गणराज विधाता
सरला मेहता
इंदौर
स्वरचित