सब्जी मंडी दुश्मन लागै, गोली रोज चलावत है।
मित्रों हिंदी दिवस पर प्रस्तुत अवधी भाषा में एक रचना।
सब्जी मंडी दुश्मन लागै, गोली रोज चलावत है।
मेहरारू चुरइल लागति है , थैली रोज थमावत है।
धनिया अस धनियाय गई है, देख कै जियरा कांपत है
मुफत मांग लेव तौ मुराव कै, मुंह पर बारह बाजत है,
पुदी पुदीना हाल न पूछौ , अदरकवा आउर ऐंठ गवा,
नींबू बईर बना है लेकिन , दमवा बढ़कर बेल हुआ,
लाख संभार चलत है लेकिन, कब गिर जाई खबर नहीं,
नट कै जईसा हाल होई गवा , मनई खुद का साधत है।
सब्जी मंडी दुश्मन लागै, गोली रोज चलावत है।
मेहरारू चुरइल लागति है , थैली रोज थमावत है।
कोहड़ा लौकी छपराप पसरी,पहिले खुब अलसात रहीं,
हम सबकै कब नंबर लागी , आपस मां बतुआत रहीं,
साग करमुआ लहक लहक कर,दुलहीन सा शरमात रहा,
तुरई , पहठा , सेम, बाकला, जादा तर जरियात रहा,
एक एक पटराप चढ़ बैठे ऐठत शान देखावत है,
सबकै दिन बदलत है इक दिन, समय सदा बतलावत है। सब्जी मंडी दुश्मन लागै, गोली रोज चलावत है
मेहरारू चुरइल लागति है , थैली रोज थमावत है।
परवल अउर टमाटर पहले से सब्जी मां बाभन हैं,
अब मशरूम , रंगीला शिमला उनका आंख देखावत है,
बैंगन कै अब ताज सजीला , चौलाई अब रानी है,
भिंडी,गोभी अउर करेला, पहिले से मनमानी है,
लहसुन कै गोराई बढ़ गै,प्याज चमकता तारा है,
ठोर्री भी खुब अकड़ देखावत ,आलू कहां बेचारा है।
सब्जी मंडी दुश्मन लागै, गोली रोज चलावत है।
मेहरारू चुरइल लागति है , थैली रोज थमावत है।
कथा बहुत है लंबी ,दुख कै बादल बड़ा घनेरा है,
खेत पात बहि गए कहूं पर,कहूं धूप का डेरा है,
मौसम अस बैंगाय गवा है,का बोओ कब पता नहीं,
ई महंगाई मां किसान कै ,आऊ मंत्री कै खता नहीं,
हरियाली सड़ जाए कहीं पर , कहीं न अंकुर आवत है,
पापी इंद्र, अहिल्या धरती ,आपन रूप देखावत है।
सब्जी मंडी दुश्मन लागै, गोली रोज चलावत है।
मेहरारू चुरइल लागति है , थैली रोज थमावत है।
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Kumar Kalhans