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14 Sep 2025 · 1 min read

ग़ज़ल

ग़ज़ल
1222 1222 122

मुहब्बत वो मुझे सिखला रही है,
ग़मों की दौड़ में ला जा रही है।

सियासत के लोग भी होते हैं अच्छे ,
ये सुन जनता बहुत गुस्सा रही है।

बड़े लोगों से मिलना तो झुके सर,
मेरी माँ हमको क्यूं समझा रही है।

ग़रीबों की मदद कैसे करें हम,
अमीरी सुन के ये झुंझला रही है।

हमें भी सरहदों पे जाना होगा,
जवानी फिर हमें उकसा रही है।

विरह के गीत गा गा के निरंतर,
मुझे काली घटा तड़पा रही है।

तुम्हारी खिड़की दानी बंद क्यूं है,
ग़ुलामी की हवा चिल्ला रही है।

( डॉ संजय दानी दुर्ग सर्वाधिकार सुरक्षित )

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