एक शब्द में कहें, तो पूरा संसार हैं पिता...
एक शब्द में कहें, तो पूरा संसार हैं पिता
मां अगर नाव हैं, तो पतवार हैं पिता
जो मुसीबत में हमारे आगे खड़े हों
और कामयाबी में हमारे पीछे
कुछ इस तरह का किरदार हैं पिता।
लेकिन, अचानक उस पिता का चले जाना
ऐसा है जैसे,
बसंत के मौसम में पतझड़ का आ जाना,
जैसे,
मुठ्ठी में से रेत का एक दम से निकाल जाना,
जैसे,
कोई जलता हुआ चिराग अब जलना भूल गया हो,
जैसे,
घुटने के बल चलते – चलते बच्चा चलना भूल गया हो,
जैसे,
होली,दीवाली सब तीज – त्यौहार वीरान हो गए हों,
जैसे,
अब सब चाचा-ताऊ भी अनजान हो गए हों,
जैसे,
ज़िन्दगी में सांसे तो हों, मगर जीने का आधार ना हो,
जैसे,
कोई रोते हुए को गले लगाए, लेकिन उस गले लगाने में प्यार ना हो,
जैसे,
सारा संसार तुम्हारा होके भी, तुम्हारा ना रहे,
जैसे,
अपने ही घर का आंगन अब, हमारा ना रहे,
कुछ इस क़दर हालत हो जातें हैं,
जब पिता अचानक साथ छोड़ जाते हैं,
जब मां टूट चुके मकान को घर में ढालती है,
पूरे दिन काम करती है, मेहनत करती है,
और हम भाई – बहनों को पालती है,
जब हमारे घर की लक्ष्मी किसी और की झूठन धोती है,
जब वो आधी रात जाग कर, पिता की याद में रोती है,
वो पता नहीं लगने देती अपनी एक बीमारी भी,
दिन – रात मेहनत कर वो, पूरा परिवार चलाती है,
ग़म चाहे बेशुमार मिलते हों उसे, मगर
वो हर शाम जब भी आती है, तो बेहद मुस्कुराती है,
पिता का जाना सिर्फ हम बच्चों को दुख नहीं देता,
ये हमारी मां का भी जीवन उजाड़ देता है,
वो रंगो को छोड़ , सफेदी अपना लेती है,
अब कोई उसे सुहागन का आशीर्वाद नहीं देता है,
ये ऐसा दर्द है, जो सारी हदों को पार कर जाता है,
इसके आने के बाद, घर में कोई रिश्तेदार भी नहीं आता है,
लेकिन,
कहते हैं वो पिता है, हमेशा साथ हैं, वो कहां जाते हैं,
जब भी कोई मेरे सिर पर हाथ फेर कर बेटा कहता है,
मै सिर उठाकर देखता हूं,मुझे अपने पिता याद आते हैं।