Sahityapedia
Sign in
Home
Your Posts
QuoteWriter
Account
13 Sep 2025 · 1 min read

तल्खियां...!

. पूर्णिका ००१४

प्रारम्भी नेह:-
चोट शब्दो के न सह पाते, जिनका स्वाभिमान होता है।
वो घाव गहरी दे जाता है, जो शख्स बद्दजबान होता है।।

किसी और कि क्या बिसात, ऐसे रिश्ते बिगाड़ दे आकर।
रिश्ता तब बिगड़ता है जब, कोई अपना बेईमान होता है।।नेह:-१।।

दर्द तभी तक है जानता, जब तक खाल में होता है नाखून।
खाल से निकलते ही यह तो, कट कर के बेजान होता है।।नेह:-२।।

फर्क बहोत पड़ता था तब, जब हम भी थे हिस्से उन्ही के।
बेफिक्री आ जाती है जब, अकेलेपन का गुमान होता है।।नेह:-३।।

बहोत बोलने वाला इंसा भी, जब गुमसुम सा रहने लगे।
उसके ज़ेहन में जरूर कोई, ज़ख्म का निशान होता है।।नेह:-४।।

परिचयी नेह:-
बिना बात पर भी बेबाकी से, क्यों मुस्कुरा देता हूँ सुन लो।
भुलाकर तल्खियां अपनो के, कहाँ हँसना आसान होता है।।

__________________________________________
©️®️ पूर्णिका-कार :- पाण्डेय चिदानन्द “चिद्रूप”
(सर्वाधिकार सुरक्षित १३/०९/२०२५)
__________________________________________

Loading...