दोहा पंचक. . . . प्रेम
दोहा पंचक. . . . प्रेम
खुद से खुद की हो गई, आज अचानक रार ।
जीवन का संघर्ष से, क्यों होता शृंगार ।।
हृदय लोक में हो गए, चित्रित प्रेम प्रसंग ।
चेतन से मिटते नहीं, प्रथम प्रणय के रंग ।।
प्रेम वेग की वीचियाँ, मन करतीं बेचैन ।
शैय्या सूनी सी लगे, काटे कटे न रैन ।।
बादल पागल प्रेम का, भिगो गया हर अंग।
प्रेम पृष्ठ के चरम पर , अंकित अंतस रंग ।।
प्रेम समर्पण माँगता, प्रेम त्याग का नाम ।
विरह प्रेम का अन्ततः, क्यों होता अंजाम ।।
सुशील सरना / 13-9-25