तन्हाई - ग़ज़ल
इश्क में तन्हाई , किसे रास आती है
तन्हाई आसुओं का , समंदर ले आती है ।
तन्हाइयों में जब भी , रातें गुजर होती हैं
करवटों का हुजूम , साथ ले आती हैं ।
तनहा आशिक से पूछिए , हाले – इश्क़
एक – एक लम्हा , सदियों सा नज़र आता है ।
तन्हाई कभी मुझको , खुदा कर देती है
कभी तन्हाई , घंटों रुला जाती है ।
खुदा न करे, इश्क़ के चाहने वाले को हो , तन्हाई नसीब
तन्हाई मौत से भी बद्तर , नज़र आती है ।
तनहा रातों का अपना ही अलग , सिला होता है
अगली सुबह, पिछली रात को बयाँ कर जाती है ।
इश्क में तन्हाई , किसे रास आती है
तन्हाई आसुओं का , समंदर ले आती है ।
तन्हाइयों में जब भी , रातें गुजर होती हैं
करवटों का हुजूम , साथ ले आती हैं ।
अनिल कुमार गुप्ता “अंजुम”