हिंदी का आलोक
भारत मां के आँखों की अंजन,
भाषा जो अति निरंजन।
अलख ज्योति ज्ञान की,
सकल प्रिया जनमानस की।
अथाह ज्ञान हो ऋषियों का,
दर्शनशास्त्र हो विद्वानों का।
या गूढ़ रहस्य हो ब्रह्मांड का,
सारे आलोकित हैं हिंदी से।
दिल खोल कराती संवाद हिंदी,
फिर भी रहती विवाद में हिंदी।
बंट जाती है प्रांतवाद में हिंदी,
मीठी बोली साधुवाद की हिंदी।
चाहे जितना भी हो विरोध,
चाहे मार्ग में हो अवरोध।
कुंजम-कुंजम साउथ का तड़का,
जैसे लगे नार्थ के बघार में।
वैसे हिंदी बिना आस्वाद नहीं,
इसमें कोई वाद नहीं।