इंग्लिश वींग्लीश के चक्कर में...!
. पूर्णिका ००१३
प्रारम्भी नेह:-
इंग्लिश वींग्लीश के चक्कर में, मोर बहुते दिमाग झन्नाईल बा।
लिखले रहली हिंदी में कविता, ऊ हिंग्लिश में छपाईल बा।।
बन तू- तू, मैं- मैं यु एंड आई, जब आप क भाव छिपावेला।
तब चाचा, मौसा, मामा, फूफा, सब अंकल कहाईल बा।।नेह:-१।।
शहरी लोगन क रहन- सहन, अउर बोल- चाल बिचित्तर बा।
दूधवा देवे वाला काऊ, दूध पिये वाला गाय बोलाईल बा।।नेह-२।।
बिन चोट लगे सब मुहँ के बनाई, काहें को हाये- हाय करे।
बायें- बाय बा उहे करे लगल, नमस्ते से जे जे टोकाईल बा।।नेह:-३।।
सुननिहं की इंटरनेटवा पर, सब ही जवाब मिल जायेला।
देखली आम आदमी गूगलवा पर, मैंगो मैन पढाईल बा।।नेह-४।।
एक दिन जिमे गइनी जजीमानी, ऊहवां फीका खीर मिलल।
कहनी ह बा भेली गूड़ त लाईं, सबके वेरी गुड बुझाईल बा।।नेह:-५।।
कहे लागल सबही लोगवा, हो करके खुश मन थंकु थैंक्यू।
भर उहे कटोरी फिर से आगे, ख़िरवे अउरी धराईल बा।।नेह:-६।।
हम अंग्रेजी में निपट गवाँर, जेकर मन शहरे में बा अटकल।
काहें जोते वाला पगहा आ बैल, डोर बेल बना लटकाईल बा।।नेह:-७।।
अजब गजब बा ई भाषा लागल, अब हम केसे का ही कहीं।
सोचत सोचत ईहे बतिया, मथवा के नसिया खिचाईल बा।।नेह:-८।।
उलट पुलट सब करके देखनी, अर्थ के समूचे अनर्थ भईल।
ई इंग्लिश वालन के पढ़ाई, लागत बा कि भुलाईल बा।।नेह:-९।।
हेल्लो हेलो बोले वालन के, धर पोखरी में हेलावल जाई।।
छोड़ी के नटई इनकर त फ़सरी, अपने नेक फ़साईल बा।।नेह:-१०।।
हिंदी ह सोच विचार के भाषा, अंग्रेजी से हमके डाउट भईल।
अंदर- बाहर, इन एंड आउट, मन छोड़ के गेटवा पराईल बा।।नेह:-११।।
टी ओ टू त काहें एन ओ नो, माथा में बा गुड़ गोबर भईल।
का लिखल का बोलन जाई सब अपने मे शब्द हेराईल बा।।नेह:-१२।।
परिचयी नेह:-
नाही भाषा ह कउनो खराब, पर समझ ना आईल जब हमके।
तबसे पढल- लिखल ‘चिद्रूप’, अंग्रेजी से खिसियाईल बा।।
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©️®️ पूर्णिका-कार :- पाण्डेय चिदानन्द “चिद्रूप”
(सर्वाधिकार सुरक्षित १३/०९/२०२५)
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