*रोज बढ़ रही हैं सड़कों की, दिन-दूनी ऊॅंचाई (हिंदी गजल)*
रोज बढ़ रही हैं सड़कों की, दिन-दूनी ऊॅंचाई (हिंदी गजल)
_______________________
1)
रोज बढ़ रही हैं सड़कों की, दिन-दूनी ऊॅंचाई
घर में बैठो तो लगता है, घर है कोई खाई
2)
सड़कों की नाली थी नीची, पहले घर था ऊॅंचा
अब हर समय गली की नाली, रहती है गुर्राई
3)
वर्षा ऋतु वैसे तो सबको, ही अच्छी लगती है
लेकिन भरी नालियों के ही, कारण आफत आई
4)
भारत की राष्ट्रीय समस्या, हर प्राचीन शहर में
घर-बाहर पानी में डूबा, वर्षा ऋतु दुखदाई
5)
ठहरा हुआ नालियों वाला, पानी यह कहता है
सेमिनार कुछ हम पर भी तो, कर लो मेरे भाई
रचयिता: रवि प्रकाश
बाजार सर्राफा (निकट मिस्टन गंज), रामपुर, उत्तर प्रदेश
मोबाइल 9997615451