गजल - 103
यहाँ तक तो ठीक था कि अब कुछ वास्ता नहीं।
मगर उसने कहा कि मुझको पहचानता नहीं।।
बुरी तो बहुत लगी पर मैंने बात टाल दी।
जब उसने कहा मुझसे कोई राब्ता नहीं।।
वो कल तलक हर इशारे पर नाचता रहा।
आज एक बात भी सुनता मानता नहीं।।
उसे बिना संगीत के ही नाचते देखा गया।
और अब डीजे बजे तो भी नाचता नहीं।।
क्यों भला घाटे में कुछ लोग हमेशा रहें।
क्यों भला कोई कभी मौका चूकता नहीं।।
नीलकंठ बन जहर के घूँट पीते हैं सभी।
साँप गले में भले ही के कोई पालता नहीं।।
सब कहें बारह साल बाद लौटता समय।
पर ‘बिसावर’ आदमी जा के लौटता नहीं।।