इश्क़-ए-फ़ना
इश्क़-ए-फ़ना
मन तू शुदम, तू मन शुदी, मन तू शुदम, तू जान शुदि।
कुछ मैं तेरा हो गया, कुछ तू मेरी हो गई।
एक फ़ना, कुछ इब्दिता;
एक फ़ना, कुछ इंतिहा;
एक फ़ना, हरदम फ़िदा;
एक फ़ना, कुछ अलविदा।
मन तू शुदम, तू मन शुदी, मन तू शुदम, तू जान शुदी।
कुछ मैं तुझमें खो गया, कुछ तू मुझमें खो गई।
एक अना, कुछ इब्तिला;
एक अना, कुछ इत्तिला;
एक अना, बेबस सदा;
एक अना, कुछ है ज़ुदा।
मन तू शुदम, तू मन शुदी, मन तू शुदम, तू जान शुदी।
कुछ मैं तुझमें डूब गया, कुछ तू मुझमें डूब गई।
एक सना, कुछ दोस्ताँ;
एक सना, कुछ दुश्मनाँ;
एक सना, हरदम सज़दा;
एक सना, कुछ शोख अदा।
मन तू शुदम, तू मन शुदी, मन तू शुदम, तू जान शुदी।
कुछ मैं आरज़ू हो गया, कुछ तू चाहत हो गई।
✍️ –कुँवर सर्वेंद्र विक्रम सिंह
*यह मेरी स्वरचित रचना है
*©️®️सर्वाधिकार सुरक्षित